बांग्लादेश में खोजा गया प्राचीन हिंदू मंदिर
Published on: June 08, 2026
By: BTNI
Location: Sundarban, Bangladesh
दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव वन सुंदरबनों की घनी जंगलों में एक आश्चर्यजनक खोज ने पूरे क्षेत्र को हिस्टोरिकल महत्व की नई किरण दी है। लगभग 500 वर्ष पुराना एक प्राचीन हिंदू मंदिर गहरी जंगलों में मिला है, जो समय की मार झेलते हुए भी अपनी भव्यता के कुछ निशान आज भी बरकरार रखे हुए है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों और रिपोर्ट्स में इसे एक रहस्यमयी खोज बताया जा रहा है, जो बांग्लादेश के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास को नई दिशा दे सकती है।
मंदिर का इतिहास और स्थान
यह मंदिर शेखर टेक (Shekher Tek / Sekher Tek / Sheikh Tek) के नाम से जाना जाता है। यह मुख्य रूप से मां काली का मंदिर है। इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, इसे 16वीं शताब्दी में राजा प्रतापादित्य (जशोर के जमींदार और बंगाल के बारा भुइयां सरदारों में से एक) द्वारा बनवाया गया था। राजा प्रतापादित्य ने पुर्तगालियों और अराकानी हमलों से अपनी भूमि की रक्षा के लिए इस क्षेत्र में सैन्य चौकियां स्थापित की थीं। मंदिर इन्हीं चौकियों का हिस्सा माना जाता है।

मंदिर शिबसा नदी (Shibsa River) के पूर्वी किनारे पर स्थित है, खुलना रेंज के वेस्ट फॉरेस्ट डिवीजन में। यह जंगलों की इतनी गहराई में है कि पहुंचना बेहद कठिन है — केवल कुछ स्थानीय लोग, वन विभाग के अधिकारी और साहसी पर्यटक ही यहां पहुंच पाते हैं। चारों तरफ घना मैंग्रोव, रॉयल बंगाल टाइगर और जंगली जानवरों का वास है। कई बार तीर्थयात्री यहां आने पर बाघों के हमलों का शिकार भी हो चुके हैं।संरचना: मंदिर ईंटों से बना हुआ है। बाहरी दीवारें 655 सेंटीमीटर (लगभग 6.55 मीटर) के बर्गाकार आधार पर खड़ी हैं। अंदर विभिन्न जगहों पर दरारें हैं और दक्षिण-पश्चिम हिस्सा काफी क्षतिग्रस्त है। समय, नमकीन हवा, जंगली पौधों और बाढ़ ने इसे काफी नुकसान पहुंचाया है, लेकिन यह अभी भी खड़ा है और सुंदरबनों में मानव सभ्यता के प्रमाण के रूप में चमक रहा है।
सुंदरबनों का ऐतिहासिक महत्व
सुंदरबन सिर्फ वन्यजीवों का घर नहीं, बल्कि प्राचीन सभ्यता का गवाह भी है। मौर्य काल (4th-2nd century BCE) से यहां मानव बस्तियां थीं। चंद सदागर जैसी लोक कथाओं में भी इस क्षेत्र का जिक्र मिलता है। मध्यकाल में यहां हिंदू मंदिरों, बस्तियों और व्यापारिक केंद्रों का विस्तार हुआ था। शेखर टेक मंदिर उन गिने-चुने अवशेषों में से एक है जो इस भुलाए हुए इतिहास को याद दिलाता है।शोधकर्ता वर्तमान में साइट का अध्ययन कर रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं — कैसे यह मंदिर इतनी घनी जंगल के बीच बना? क्या पहले यहां बड़ी बस्ती थी जो बाद में जंगल ने निगल ली? या यह किसी विशेष धार्मिक महत्व का केंद्र था? सरकार इसे पर्यटन स्थल बनाने की योजना बना रही है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है, लेकिन संरक्षण की चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
ALSO READ-
- Congress to Mobilise for November 1 Rally in Delhi to Protect Voting Rights: Rajesh Thakur
- Rajnandgaon Joint Team Seizes Three LPG Cylinders During Inspection of Biryani Centres
- Remarks About PM Narendra Modi’s Late Father Violate Political Decorum: Khubchand Parkh
- Lalbagh Police Seize 145 Pouches of Illegal Liquor from Footwear Shop in Rajnandgaon
- ‘Safe Childhood’ Campaign: Legal Awareness Camps Organised in Rajnandgaon Schools
क्यों है यह खोज इतनी महत्वपूर्ण?
सांस्कृतिक विरासत: यह मंदिर हिंदू परंपरा, काली पूजा और बंगाल के मध्यकालीन इतिहास को जोड़ता है।
पर्यटन की संभावना: यदि ठीक से संरक्षित किया जाए तो सुंदरबनों के साथ यह एक नया आकर्षण बन सकता है।
पर्यावरणीय संदेश: जंगल और मानव इतिहास का सह-अस्तित्व दिखाता है।
रहस्य: आज भी मंदिर के आसपास बाघों के निशान मिलते हैं। स्थानीय लोग इसे “दक्षिण राय” या “बोनबिबी” की लोक परंपराओं से जोड़कर देखते हैं।
सोशल मीडिया यूजर्स इस खोज पर उत्साहित हैं। एक यूजर ने लिखा, “सुंदरबनों की जंगलों में छिपे ऐसे रहस्य हमें हमारे पूर्वजों की बहादुरी और आस्था की याद दिलाते हैं।”
संरक्षण की अपील
मंदिर वर्तमान में जंगलों की गोद में है, लेकिन क्षरण तेजी से हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि तत्काल संरक्षण, रखरखाव और शोध की जरूरत है ताकि यह अमूल्य धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए बची रहे।निष्कर्ष: सुंदरबनों का यह 500 वर्ष पुराना हिंदू मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि एक युग का साक्षी है — जहां देवी काली की आराधना, राजाओं की बहादुरी और प्रकृति का रौद्र रूप एक साथ मौजूद है। यह खोज हमें सिखाती है कि इतिहास कभी पूरी तरह नहीं मिटता, वह जंगलों की गहराई में भी जीवित रहता है।



