सत्ता परिवर्तन के साथ श्रद्धा की जीत
Published on: May 05, 2026
By: BTNI
Location: Asansol, India
असनसोल (पश्चिम बर्द्धमान), ५ मई २०२६: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव २०२६ में भाजपा की भारी जीत के ठीक अगले दिन असनसोल के बस्तिन बाजार इलाके में स्थित श्री श्री दुर्गामाता चैरिटेबल ट्रस्ट मंदिर के द्वार भक्तों के लिए पूर्ण रूप से खोल दिए गए। यह मंदिर करीब १५ वर्षों से ज्यादातर बंद रहा था और केवल दुर्गा पूजा व लक्ष्मी पूजा जैसे प्रमुख त्योहारों पर ही सीमित पूजा-अर्चना की अनुमति थी।
पृष्ठभूमि: बंदी और तनाव
स्थानीय सूत्रों और भक्तों के अनुसार, २०११ में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सत्ता में आने के बाद स्थानीय समुदायों के बीच तनाव के चलते मंदिर को बंद रखा गया। कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रशासनिक दबाव और “सांप्रदायिक सद्भाव” बनाए रखने के नाम पर मंदिर को खोलने की अनुमति नहीं दी गई। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि यदि मंदिर पूरे साल खोला गया तो “खून की नदियां बहेंगी” जैसे खतरे भरे बयान दिए गए थे।
भक्तों का कहना है कि वर्षों तक उनकी मां दुर्गा के दर्शन के लिए तरसते रहे। मंदिर समिति के सदस्य और भाजपा नेता नीलू चक्रवर्ती ने बताया कि इस मुद्दे को लेकर केंद्र और राज्य स्तर पर बार-बार अपील की गई, लेकिन टीएमसी शासन में कोई समाधान नहीं निकला।
भाजपा की जीत और मंदिर का पुनः उद्घाटन
५ मई २०२६ को चुनाव परिणाम आने के बाद असनसोल उत्तर सीट से विजयी भाजपा विधायक कृष्णेन्दु मुखर्जी (जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान मंदिर को साल भर खुला रखने का वादा किया था) और अन्य भाजपा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में मंदिर खोल दिया गया। भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी, पटाखे फोड़े गए और जयकारों से पूरा इलाका गूंज उठा।
पश्चिम बर्द्धमान जिले की सभी ९ विधानसभा सीटों पर भाजपा का सूपड़ा साफ होने के बाद यह पहला बड़ा सांस्कृतिक-सामाजिक बदलाव माना जा रहा है। मंदिर अब पूरे वर्ष भक्तों के लिए खुला रहेगा।
प्रतिक्रियाएं
भक्तों की खुशी: “आज हमारी मां दुर्गा के दर्शन हो सके, यह सत्ता की ताकत नहीं, बल्कि जनादेश की ताकत है,” एक स्थानीय भक्त ने भावुक होकर कहा।
आलोचना: कुछ विपक्षी आवाजों ने इसे राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया और कहा कि धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए।
यह घटना पश्चिम बंगाल में १५ वर्षों के टीएमसी शासन के बाद भाजपा सरकार बनने के प्रतीकात्मक महत्व को रेखांकित करती है। असनसोल दुर्गा मंदिर अब न केवल श्रद्धा का केंद्र बनेगा, बल्कि “सत्ता परिवर्तन के साथ सांस्कृतिक मुक्ति” का उदाहरण भी।
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