छात्र की कॉपी गायब, दूसरी थोप दी; शिक्षा व्यवस्था की अंतिम धज्जियाँ उड़ गईं
Published on: May 25, 2026
By: BTNI
Location: New Delhi, India
वेदांत नाम का एक मेधावी छात्र इस साल CBSE कक्षा 12 की परीक्षा देता है। फिजिक्स में उसकी उम्मीदें ऊँची थीं। रिजल्ट आया तो नंबर उम्मीद से काफी कम। री-चेकिंग और आंसर शीट की फोटोकॉपी माँगी। जब फोटोकॉपी आई तो वेदांत सकते में – वो उसकी कॉपी ही नहीं थी। हैंडराइटिंग अलग, जवाब अलग। लड़के ने साफ कहा – “ये मेरी लिखाई नहीं है।” CBSE ने इस बार कॉपियों की जाँच के लिए एक ‘नई डिजिटल तकनीक’ का इस्तेमाल किया था। अब पता चल रहा है कि ये तकनीक न सिर्फ वेदांत के साथ बल्कि हजारों छात्रों के साथ ‘चमत्कार’ कर रही है। नंबर कम आए, री-इवैल्यूएशन में भी सुधार नहीं, और जब आंसर शीट माँगी तो या तो गलत कॉपी मिल रही है या फिर ‘डिजिटल गड़बड़’ का बहाना।शिक्षा व्यवस्था की इस नई ‘डिजिटल क्रांति’ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हमारे यहाँ परीक्षा सिर्फ छात्रों की नहीं, बल्कि सिस्टम की अक्षमता, लापरवाही और अब तो चोरी-छिपे हेराफेरी की भी परीक्षा बन गई है।
वेदांत का दर्द, सिस्टम का ‘डिजिटल’ बचाव
वेदांत के पिता ने बताया, “बेटा रात-रात भर पढ़ता था। फिजिक्स में 90+ की उम्मीद थी। 70 के करीब नंबर आए। जब फोटोकॉपी आई तो लड़का रो पड़ा। कहा – पापा ये मेरी कॉपी नहीं।” परिवार ने CBSE को शिकायत की है। अब तक कोई ठोस जवाब नहीं। सूत्र बताते हैं कि कई अन्य छात्र भी इसी शिकायत के साथ आगे आए हैं। कुछ का कहना है कि उनकी कॉपी में तो जवाब ही अलग लिखे थे।CBSE अधिकारियों का बचाव तैयार है – “डिजिटल स्कैनिंग में कभी-कभी गड़बड़ी हो सकती है।” सवाल उठता है – जब स्कैनिंग ही गलत हो रही है तो फिर मूल कॉपियाँ कहाँ गईं? क्या वे गायब हो गई हैं? या फिर जानबूझकर दूसरी कॉपियाँ थोप दी जा रही हैं? क्या ये सिर्फ ‘तकनीकी खामी’ है या सिस्टमेटिक लापरवाही का नया रूप?

शिक्षा का ‘डिजिटल’ महाभारत
यह घटना कोई अलग घटना नहीं। पिछले कुछ सालों से CBSE की छवि लगातार धूमिल हो रही है। एक तरफ NEET, UGC-NET जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक के घोटाले, दूसरी तरफ मूल्यांकन में मनमानी। अब डिजिटल तकनीक के नाम पर नई खेल शुरू। छात्रों को बताया जाता है – “तुम्हारी मेहनत का मूल्यांकन अब AI और डिजिटल सॉफ्टवेयर करेगा।” लेकिन हकीकत ये है कि AI तो सही से काम नहीं कर रहा, और मानव मूल्यांकनकर्ता पहले से ही थके-हारे, कम वेतन वाले और दबाव में काम कर रहे हैं।नतीजा? लाखों छात्रों का भविष्य अंधेरे में। कोचिंग फैक्टरियां तो फल-फूल रही हैं, लेकिन स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई पर भरोसा खत्म होता जा रहा है। अभिभावक कह रहे हैं – “पढ़ाई करवाओ या कोचिंग? परीक्षा देनी है या लड़ाई लड़नी है?” शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. अनिल कुमार का कहना है, “ये सिर्फ एक लड़के की कहानी नहीं। ये पूरे मूल्यांकन तंत्र की विफलता है। जब छात्र को अपनी ही कॉपी नहीं मिलती, तो फिर परीक्षा का उद्देश्य क्या बचा? सर्टिफिकेट बाँटना या सच्ची प्रतिभा को निखारना?
”व्यंग्य की पराकाष्ठा: ‘सफल’ शिक्षा मॉडल
हमारा शिक्षा तंत्र आज ‘सफल’ है – उस अर्थ में कि यह छात्रों को असफल बनाने में बेहद कामयाब है। पढ़ने वाले को कम नंबर, रटने वाले को टॉपper बना दो।
कोई शिकायत करे तो ‘डिजिटल एरर’ बोल दो।
फोटोकॉपी माँगे तो गलत शीट थोप दो।
फिर कह दो – “बच्चे, अगले साल फिर प्रयास करो।”देश में करोड़ों युवा बेरोजगार घूम रहे हैं, लेकिन बोर्ड एग्जाम में 95%+ लाने वाले हर साल बढ़ते जा रहे हैं। क्या ये संयोग है? या फिर ‘ग्रेड इन्फ्लेशन’ और ‘मास कॉपी चेकिंग’ का गणित? शिक्षक कम, छात्र ज्यादा, कॉपियाँ ढेर। मूल्यांकनकर्ता प्रति कॉपी 10-15 रुपये में काम करते हैं। जल्दबाजी में चेकिंग, गलतियों की भरमार। अब डिजिटल तकनीक ने नया आयाम जोड़ दिया – गलती अब ‘मशीन’ की, जिम्मेदारी किसी की नहीं।
माँग: तुरंत जांच, जवाबदेही तय हो
वेदांत जैसे हजारों छात्रों की आवाज अब सोशल मीडिया पर गूँज रही है। अभिभावक संगठन और शिक्षा कार्यकर्ता CBSE से तुरंत उच्च स्तरीय जांच की माँग कर रहे हैं। सवाल ये हैं:मूल कॉपियाँ कहाँ हैं?
डिजिटल स्कैनिंग की प्रक्रिया क्या है? उसकी पारदर्शिता कहाँ?
गलत फोटोकॉपी देने वाले अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?
इस ‘नई तकनीक’ को किस कंपनी ने दिया? क्या उसमें कोई हित संबंध तो नहीं?
अगर ये आरोप सही साबित होते हैं तो ये न सिर्फ CBSE बल्कि पूरे भारतीय शिक्षा तंत्र पर सवाल है। एक सिस्टम जो छात्र की मेहनत का सम्मान नहीं कर सकता, जो उसकी कॉपी तक सुरक्षित नहीं रख सकता, वो भविष्य कैसे तैयार करेगा?
अंत में…
वेदांत आज सिर्फ अपना नंबर वापस माँग रहा है। लेकिन सवाल बड़ा है – हमारा शिक्षा तंत्र कितने वेदांतों को रोज चुपचाप कुचल रहा है? जब परीक्षा में ईमानदारी नहीं, मूल्यांकन में पारदर्शिता नहीं, और जवाबदेही नाम की चीज नहीं बची, तो ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘विकसित भारत’ के सपने सिर्फ प्रचार बनकर रह जाएँगे। शिक्षा राष्ट्र का backbone होती है। लेकिन आज ये backbone ही ‘डिजिटल हर्निया’ का शिकार नजर आ रहा है।
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