मातृभाषा और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान
Published on: May 25, 2026
By: BTNI
Location: New Delhi , India
भीषण गर्मी और नवताप्प (नवतपा) की शुरुआत के बीच प्रधानमंत्री ने देशवासियों को सकारात्मक संदेश देते हुए प्रकृति की कृपा और सूर्य-वर्षा के आशीर्वाद की बात की। साथ ही उन्होंने एक प्राचीन संस्कृत मंत्र लिखकर अपनी भावना व्यक्त की, जो उनके मन में मातृभाषा संस्कृत के प्रति गहन सम्मान को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री ने लिखा: “प्रकृति की असीम कृपा, सूर्यदेव की ऊर्जा और वर्षा का पावन आशीर्वाद हम सभी के जीवन को सुख-सौभाग्य से समृद्ध करता है। मेरी कामना है कि धरती पर सदैव हरियाली और खुशहाली बनी रहे।
”शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः।
शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥
यह मंत्र वैदिक परंपरा से लिया गया है, जिसमें सूर्य (सविता), उषा (प्रभात), वर्षा (पर्जन्य) और क्षेत्र के स्वामी से कल्याण की कामना की गई है। प्रधानमंत्री के इस संदेश ने सोशल मीडिया पर व्यापक सराहना बटोरी है।
मातृभाषा संस्कृत के प्रति गहरा आदर
राजनीतिक विश्लेषकों और संस्कृत विद्वानों का मानना है कि प्रधानमंत्री द्वारा नवताप्प जैसे मौसम संबंधी संदेश में संस्कृत मंत्र का चयन कोई संयोग नहीं है। यह उनके व्यक्तिगत और सांस्कृतिक लगाव को दर्शाता है। पिछले वर्षों में भी प्रधानमंत्री ने कई मौकों पर संस्कृत श्लोकों और मंत्रों का उपयोग किया है – चाहे वह स्वतंत्रता दिवस के भाषण हों, योग दिवस हों या फिर पर्यावरण और प्रकृति से जुड़े संदेश।संस्कृत विद्वान डॉ. रमेश द्विवेदी ने कहा, “प्रधानमंत्री जी का यह कदम संस्कृत को मात्र एक मृत भाषा समझने वाले धारणाओं को तोड़ता है। वे संस्कृत को जीवंत, प्रासंगिक और आध्यात्मिक-पर्यावरणीय संदेशों के माध्यम से जोड़ रहे हैं। नवताप्प जैसे कठिन मौसम में सविता, पर्जन्य और उषा का मंत्र चुनना प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने का सुंदर उदाहरण है।
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”नवताप्प में सकारात्मक संदेश
देश के कई हिस्सों में इन दिनों तापमान 45-48 डिग्री तक पहुँच रहा है। नवताप्प की शुरुआत के साथ स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियाँ जारी की जा रही हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का संदेश न केवल मौसम की चुनौती को स्वीकार करता है, बल्कि प्रकृति के सकारात्मक पक्ष – सूर्य की ऊर्जा, वर्षा की आशा और हरियाली की कामना – पर जोर देता है।यह दृष्टिकोण ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और पर्यावरण संरक्षण की भारतीय परंपरा से जुड़ा है। कई नागरिकों ने इस संदेश को ‘आशावादी और सांस्कृतिक’ बताया। एक यूजर ने लिखा, “गर्मी में भी प्रधानमंत्री जी ने सूर्यदेव की ऊर्जा और पर्जन्य देव की कामना की – यह नेतृत्व है।
”राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व
विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने इसे ‘प्रतीकात्मक’ बताया, लेकिन अधिकांश संस्कृति प्रेमियों और आम नागरिकों ने प्रधानमंत्री की इस पहल की सराहना की। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक भारत में प्राचीन ज्ञान-परंपरा को जोड़ने की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम है।संस्कृत भारती के महासचिव ने कहा, “जब देश का प्रधानमंत्री सार्वजनिक संदेश में संस्कृत मंत्र का प्रयोग करता है, तो युवा पीढ़ी में भी इस भाषा के प्रति सम्मान बढ़ता है। यह मातृभाषा और मातृभूमि दोनों के प्रति समर्पण दिखाता है।
”अंत में…
प्रधानमंत्री का यह संदेश सिर्फ एक मौसमी शुभकामना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पर्यावरण चेतना और प्राचीन भाषा के प्रति उनके अटूट लगाव का प्रतीक है। नवताप्प की चुनौती भले ही कठिन हो, लेकिन सनातन परंपरा के अनुसार सूर्य, वर्षा और धरती की पूजा से ही समृद्धि संभव है – यही संदेश प्रधानमंत्री ने दिया है।देशवासी उम्मीद करते हैं कि प्रकृति की कृपा बनी रहे और प्रधानमंत्री के इस सांस्कृतिक संदेश से नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़े।
जय सूर्य, जय पर्जन्य, जय संस्कृति।
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