गंज मंडी की ऐतिहासिक होली से सजा राजनांदगांव का उत्सव
150 वर्षों की परंपरा के साथ राजनांदगांव में होलिका दहन का भव्य आयोजन
Published on: March 06, 2026
By: BTNI
Location: Rajnandgaon, India
संस्कारधानी राजनांदगांव में इस वर्ष होली का पर्व परंपरागत उत्साह और धार्मिक आस्था के साथ धूमधाम से मनाया गया। ज्योतिषियों द्वारा बताए गए मुहूर्त और भद्राकाल के कारण इस बार होलिका दहन देर रात लगभग 3 बजे के बाद किया गया। शहर के विभिन्न मोहल्लों में परंपरा के अनुसार होलिका दहन हुआ, जहां स्थानीय लोगों ने एकत्रित होकर पूजा-अर्चना की।

राजनांदगांव की सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक नगर होली लगभग 150 वर्षों से पुरानी कृषि उपज मंडी (पुरानी गंज मंडी) में जलाई जाती है। यह परंपरा लंबे समय से शहर के व्यापारियों सहित मंडी के व्यापारियों द्वारा निभाई जा रही है। रात के समय यहां बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं और पूरे विधि-विधान के साथ होलिका दहन किया जाता है। यहां होलिका दहन जब भी हो लेकिन होलिका शाम होने के पूर्व से ही से जाती है जिसमें लकड़ीयों और गोबर छेना का अनुपात 30 और 70 का होता है।
शाम होते ही शहर के लोगों का सजीव होलिका का पूजन हेतु आना जाना शुरू हो जाता है और लोग होलिका की फेरी देते हैं,भोग लगाते हैं, मारवाड़ी समुदाय के लोग लापसी का भोग लगाते हैं और घर में बनाएं एक एक व्यंजन का भोग लगाते हैं,शर्करा एवं गोबर के छोटे छेने की मालाओं से भी होलिका लद जाती है। लोगों का इस स्थल तक आना जाना,पूजन करना तथा फेरी देना सुबह तक लगातार चलते रहता है। अनेक लोग आज भी परंपरागत रूप से होलिका दहन के बाद सुबह यहां से अग्नि लेकर घर ले जाते हैं।
इस अवसर पर विशेष रूप से राजस्थान समाज की महिलाएं पारंपरिक परिधान—रंग-बिरंगी चुन्नियों और घाघरों में सजकर आती हैं, वहीं पुरुष राजस्थानी टोपी पहनकर और हाथों में नई फसल की गेहूं की बालियां लेकर पूजा में भाग लेते हैं। पूजा की थाली, दीपक और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ होलिका की आराधना की जाती है।

गंज मंडी के समीप स्थित प्राचीन गंज के बालाजी मंदिर में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। परंपरा के अनुसार शहर के कई अन्य मंदिरों और स्थानों की होली भी गंज मंडी की होली से अग्नि लेकर प्रज्वलित की जाती है। उदाहरण के लिए रामदेव बाबा मंदिर में जलाई जाने वाली होली भी इसी अग्नि से प्रज्वलित की जाती है, जिसे कई लोग शहर की पारंपरिक होली का प्रतीक मानते हैं। पहले स्वर्गीय प्रकाश तंवर और उनके बाद बाबा मंदिर के पुजारीद्वय शरद एवं कोमल तंवर इस परंपरा को बनाए रखें हुए हैं।
इस वर्ष ज्योतिषीय कारणों से 3 तारीख को चन्द्र ग्रहण होने के कारण होली पर रंग नहीं खेला गया और रंगोत्सव 4 तारीख की सुबह से पूरे शहर में धूमधाम से मनाया गया।
शहर के मोहल्लों, कॉलोनियों, अपार्टमेंट्स और सड़कों पर लोगों ने पारंपरिक रंग-गुलाल के साथ होली खेली और एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं।

होली उत्सव की सबसे आकर्षक झांकी सत्यनारायण मंदिर से निकलने वाली पारंपरिक शोभायात्रा रही। पिछले लगभग 35-40 वर्षों से निकल रही इस झांकी में राधा-कृष्ण ने शहर के लोगों के साथ खूब होली खेली और होली का यह रंगारंग दृश्य लोगों के आकर्षण का केंद्र बना। काफी संख्या में लोग इस होली जूलूस का विडियो एवं रीव्स बनाकर वायरल करके भी इसका आनंद उठा रहे हैं।
बड़ी संख्या में व्यापारी, सामाजिक संगठन और आम नागरिक इस जुलूस में शामिल होते हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता खूबचंद पारख सहित महापौर मधुसूदन यादव एवं भाजपा नेता तथा छत्तीसगढ़ पर्यटन निगम के अध्यक्ष नीलू शर्मा, आशीष शर्मा जिस मस्ती में इस जूलूस में दिखाई दिए उससे पूरे शहर में यही चर्चा है कि इन्हें सादी ठंडाई बताकर धोखे में रखकर भांग मिली सांद्र ठंडाई पीला दी गई थी।
करीब ढाई से तीन घंटे तक चलने वाली यह शोभायात्रा पूरे नगर का भ्रमण करती हुई अंत में गंज के बालाजी मंदिर पहुंचकर परंपरागत रूप से संपन्न हुई।
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इस दौरान शहर के छोटे-बड़े व्यापारी, मजदूर, सामाजिक कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि सभी वर्गों के लोग इसमें शामिल होकर उत्सव को सामूहिक रूप से मनाते हैं।
इस प्रकार राजनांदगांव में होली का पर्व न केवल रंगों का उत्सव रहा, बल्कि शहर की सामाजिक एकता, सांस्कृतिक परंपरा और धार्मिक आस्था का भी अद्भुत प्रतीक बनकर सामने आया।



