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वक़्फ़ संशोधन: मुस्लिम समुदाय के कल्याण हेतु पारदर्शी और जवाबदेह प्रबंधनके लिए आह्वान

आर्टिकल

हाजी सैयद सलमान चिश्ती द्वारा
गद्दी नशीन – दरगाह अजमेर शरीफ़
अध्यक्ष – चिश्ती फ़ाउंडेशन

भारत के धार्मिक और सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य के सामाजिक और बेहद विविध ताने-बाने में, वक़्फ़ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था है, लेकिन यह अब तक पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं कर पाई है। इस्लामी आध्यात्मिक परंपरा में गहराई से समाई हुई यह वैधानिक इकाई भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को बदलने की क्षमता रखती है। हालांकि, अपनी समृद्ध विरासत और विशाल भूमि संपत्तियों के बावजूद, वक़्फ़ अक्षमताओं, कुप्रबंधन और पारदर्शिता की कमी की वजह से पिछड़ गया है।
यह वास्तव में विरोधाभासी है कि भारत में तीसरी सबसे बड़ी भूमि स्वामित्व वाली इकाई के रूप में वक़्फ़ एक ऐसे समुदाय की देखरेख करता है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक-आर्थिक उत्थान के मुद्दों से जूझ रहा है। सदियों पहले स्थापित वक़्फ़ का मूल उद्देश्य मुस्लिम समुदाय के लिए स्कूल, अस्पताल, पुस्तकालय और अन्य परोपकारी संस्थानों की स्थापना और देखरेख करना था। यह चिंता का विषय है कि इतना विशाल संसाधन आधार होने के बावजूद इन्हें समुदाय के कल्याण के लिए प्रभावी रूप से उपयोग में नहीं लाया जा रहा है।
प्रस्तावित उम्मीद वक़्फ़ विधेयक संशोधन का उद्देश्य वक़्फ़ को परेशान करने वाले कुछ पुराने मुद्दों को संबोधित करना है। ये सुधार अत्यंत आवश्यक हैं, क्योंकि मुस्लिम समुदाय में व्यापक रूप से यह सहमति बन चुकी है कि वक़्फ़ संपत्तियों का दुरुपयोग हुआ है। कई मुतवल्ली (संरक्षक), जो जिम्मेदारी निभाने योग्य नहीं हैं, इन संपत्तियों के कुप्रबंधन के जिम्मेदार रहे हैं। वक़्फ़ बोर्ड की अक्षमताओं के कारण इन संपत्तियों का सर्वोत्तम उपयोग नहीं हो पाया है।
वक़्फ़ की वर्तमान स्थिति भारत में मुस्लिम समुदाय के सामने आने वाली व्यापक चुनौतियों का प्रतिबिंब है। वक़्फ़ संपत्तियों के प्रबंधन में जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी ने अक्षमताओं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है।
मौजूदा वक़्फ़ व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या वक़्फ़ के स्वामित्व वाली संपत्तियों के लिए अप्रचलित किराया नीति है। इनमें से कई संपत्तियां दशकों पहले तय की गई दरों पर किराए पर दी गई हैं, अक्सर 1950 के दशक तक। न केवल ये किराए आज के बाजार दर से बेहद कम हैं, बल्कि यह मामूली किराया भी नियमित रूप से नहीं वसूला जाता है। यह स्थिति वक़्फ़ संपत्तियों की अवैध बिक्री और बरबादी के आरोपों से और भी जटिल हो गई है, जिसने संभावित राजस्व को काफी हद तक नष्ट कर दिया है और जिसका उपयोग सामुदायिक कल्याण के लिए किया जा सकता था। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण जयपुर शहर का सबसे केंद्रीय और प्रसिद्ध शॉपिंग स्ट्रीट है, जिसे एमआई रोड के रूप में जाना जाता है और जो सांगानेरी गेट से गवर्नमेंट हॉस्टल तक जाता है। बहुत से लोग नहीं जानते होंगे कि एमआई का मतलब मिर्जा इस्माइल रोड है। जयपुर में एमआई रोड पर स्थित कुछ संपत्तियां सामुदायिक और धार्मिक कार्यों के लिए वक़्फ़ बोर्ड को दान कर दी गई हैं। बोर्ड इन संपत्तियों को किराए पर दे सकता है, लेकिन किसी को बेच नहीं सकता। एमआई रोड पर 100 वर्ग फीट से लेकर 400 वर्ग फीट तक की कई ऐसी व्यावसायिक संपत्तियां हैं, जिनका किराया 300 रुपये प्रति माह है, किराया नीति अद्यतन होने पर इनका किराया करीब 25,000 रुपये प्रति माह हो जाएगा। कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के हर राज्य में ऐसी हजारों संपत्तियां हैं, जिनका उचित उपयोग नहीं किया जा रहा है।
सच्चर समिति की 2006 की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि वक़्फ़ अपनी संपत्तियों से सालाना 12,000 करोड़ रुपये की आय का सृजन कर सकता है। हालांकि, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय द्वारा किए गए हालिया सर्वेक्षणों से अब पता चलता है कि वक़्फ़ संपत्तियों की वास्तविक संख्या 8.72 लाख से अधिक है। आज, मुद्रास्फीति और संशोधित अनुमानों को ध्यान में रखते हुए, संभावित आय सालाना 20,000 करोड़ रुपये तक हो सकती है। फिर भी, वास्तविक राजस्व 200 करोड़ रुपये ही है – जो पेशेवर और पारदर्शी प्रबंधन के साथ प्राप्त की जा सकने वाली आय का एक अंश है।
सामुदायिक कल्याण में राजस्व सृजन और निवेश की संभावना बहुत अधिक है। यदि कुशलतापूर्वक प्रबंधित किया जाए, तो वक़्फ़ संपत्तियां विश्व स्तरीय संस्थानों – स्कूल, विश्वविद्यालय, अस्पताल, और बहुत कुछ – की स्थापना के लिए धन दे सकती हैं, जो न केवल भारतीय मुस्लिम समुदाय, बल्कि बड़े पैमाने पर समाज की सेवा कर सकती हैं। यहीं पर हमें, भारतीय मुसलमानों के रूप में, “कल्याण” की अपनी समझ को व्यापक बनाना चाहिए। कल्याण का मतलब मुफ्त, खस्ताहाल संस्थान नहीं है, जो खुद को बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं। इसके बजाय, हमें ऐसे संस्थानों के निर्माण की आकांक्षा करनी चाहिए, जो आत्म-निर्भर हों, समावेशी हों तथा ऐसे उच्च मानकों वाले हों कि वे सभी के लिए आकांक्षापूर्ण बन जाएं।
संयुक्त संसदीय समिति के सकारात्मक सुझावों के बाद उम्मीद वक़्फ़ विधेयक संशोधनों में वक़्फ़ विकास के उचित स्थान और दायरे के प्रति दूरदर्शी प्रतिबद्धता होनी चाहिए, जिससे मुस्लिम समुदाय का समग्र उत्थान हो सके। वक़्फ़ बोर्डों और केंद्रीय वक़्फ़ परिषद (सीडब्ल्यूसी) के शासन और प्रशासन में सुधार करके यह विधेयक एक अधिक जवाबदेह और पारदर्शी व्यवस्था कायम करना चाहता है, जिससे समुदाय की बेहतर सेवा हो सके।
लेकिन सुधार शासन तक ही तक ही नहीं रुकने चाहिए। वक़्फ़ बोर्ड के विश्वसनीय प्रशासन को राजस्व सृजन के महत्वपूर्ण मुद्दे को भी संबोधित करना चाहिए। वक़्फ़ संपत्तियों के किराया-ढांचे को संशोधित करके वर्तमान बाजार दरों के अनुरूप लाया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना वक़्फ़ की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। इसके अलावा, इन संपत्तियों से उत्पन्न लाभ को वक़्फ़ संस्था के मूल उद्देश्य के अनुरूप मुस्लिम समुदाय की कल्याणकारी परियोजनाओं में फिर से निवेश किया जाना चाहिए।
अंत में, भारतीय मुसलमानों के रूप में, हमें यह पहचानना चाहिए कि वक़्फ़ एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्था है, जिसे विफल नहीं होने दिया जा सकता। यह न केवल सामाजिक-आर्थिक विकास के मामले में, बल्कि समावेशिता और उत्कृष्टता की भावना को बढ़ावा देने के मामले में भी हमारे समुदाय की क्षमता को सामने लाने की कुंजी है। सुधार को अपनाकर और जवाबदेही की मांग करके हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वक़्फ़ मुस्लिम समुदाय को लाभ पहुंचाने और व्यापक समाज में योगदान देने के अपने इच्छित उद्देश्य को पूरा करे।
सुधार का समय अब आ गया है, और यह सुनिश्चित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि वक़्फ़ मुस्लिम समुदाय और हमारे देश में अच्छे कामों के लिए एक ताकत के रूप में अपनी क्षमता को मूर्त रूप दे। आइए हम सामुदायिक विकास पर फिर से ध्यान केंद्रित करें और उसमें शामिल हों तथा एक ऐसे भविष्य को बनाने की दिशा में काम करें, जहां वक़्फ़ संस्थाएं सभी के लिए आशा, अवसर और समृद्धि की चमकती किरणें बन जाएं।

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