सीबीआई निदेशक चयन बैठक में शामिल हुए, लेकिन असहमति जताई
Published on: May 12, 2026
By: BTNI
Location: New Delhi, India
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी मंगलवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास 7, लोक कल्याण मार्ग पहुंचे। यह मुलाकात केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के अगले निदेशक के चयन के लिए उच्चस्तरीय समिति की बैठक के लिए हुई थी। बैठक में प्रधानमंत्री मोदी, भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और राहुल गांधी शामिल हुए। हालांकि, बैठक के बाद राहुल गांधी ने प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताते हुए असहमति दर्ज कराई और प्रधानमंत्री को पत्र लिखा।
यह घटना भारतीय राजनीति में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच संस्थागत नियुक्तियों को लेकर चल रही तनातनी को रेखांकित करती है। राहुल गांधी के पहुंचने और बैठक से निकलने के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए, जिससे राजनीतिक हलकों में चर्चा छिड़ गई।
बैठक का संदर्भ और महत्व
सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद का दो वर्ष का कार्यकाल 24 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति द्वारा की जाती है। यह प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर आधारित है, ताकि संस्था की स्वायत्तता बनी रहे।आज की बैठक में 1989 से 1992 बैच के कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नामों पर चर्चा हुई, जिनमें लगभग 69 उम्मीदवारों के रिकॉर्ड शामिल थे। सरकार का दावा है कि प्रक्रिया पारदर्शी और योग्यता आधारित है, लेकिन विपक्ष इसे औपचारिकता भर मानता है।
राहुल गांधी ने बैठक से पहले और दौरान दस्तावेजों की कमी की शिकायत की। उन्होंने आरोप लगाया कि उम्मीदवारों के स्व-मूल्यांकन रिपोर्ट (self-appraisal reports) और 360 डिग्री फीडबैक रिपोर्ट उन्हें समय पर उपलब्ध नहीं कराई गईं। बैठक में पहली बार इतने सारे रिकॉर्ड देखने को कहा गया, जिसे उन्होंने “पूर्वाग्रही और अनुचित” प्रक्रिया बताया।
राहुल गांधी की असहमति और पत्र
बैठक के बाद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा और औपचारिक रूप से असहमति (dissent note) दर्ज कराई। उन्होंने कहा:”मुझे उम्मीदवारों की स्व-मूल्यांकन रिपोर्ट और 360 डिग्री रिपोर्ट नहीं दी गई। इसके बजाय मुझे बैठक के दौरान 69 उम्मीदवारों के मूल्यांकन रिकॉर्ड पहली बार जांचने को कहा गया।”
राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सीबीआई जैसी एजेंसियों का विपक्षी नेताओं और दलों के खिलाफ दुरुपयोग करती रही है। उन्होंने कहा कि समिति की भूमिका महज औपचारिकता बनकर रह गई है, जबकि विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी एजेंसी के दुरुपयोग को रोकने की है। यह उनकी पिछली असहमतियों (मई 2025 और अक्टूबर 2025) का continuation है।कांग्रेस ने इसे “लोकतंत्र पर हमला” बताया और मांग की कि नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
बीजेपी पक्ष: सरकार ने राहुल गांधी की आलोचना को राजनीतिक स्टंट करार दिया। उन्होंने कहा कि बैठक में सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया और विपक्ष हर मुद्दे पर विरोध के लिए विरोध कर रहा है।
कांग्रेस और विपक्ष: राहुल गांधी की असहमति को मजबूत कदम बताया गया। कई विपक्षी नेता इसे “संस्थाओं की रक्षा” के रूप में देख रहे हैं।
यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच सीधे संवाद दुर्लभ है। अतीत में भी ऐसी बैठकें हुई हैं, जैसे दिसंबर 2025 में सूचना आयुक्त नियुक्ति पर 88 मिनट की बैठक, लेकिन राजनीतिक मतभेद बने रहे।
व्यापक संदर्भ: मोदी-राहुल संबंध
राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मोदी के बीच संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। संसद में तीखी बहस, चुनावी रैलियों में आरोप-प्रत्यारोप और हाल ही में पश्चिम एशिया संकट पर मोदी की अपील (ईंधन बचत, सोना न खरीदना आदि) को राहुल ने “सरकार की विफलता का प्रमाण” बताया था।
फिर भी, संसद परिसर में ज्योतिबा फुले श्रद्धांजलि समारोह जैसे मौकों पर दोनों नेताओं के बीच संक्षिप्त बातचीत देखी गई है, जो राजनीतिक शिष्टाचार दर्शाती है।
नवीनतम अपडेट (12 मई 2026 शाम तक)
- बैठक समाप्त होने के बाद राहुल गांधी 7 लोक कल्याण मार्ग से रवाना हो गए।
- सीबीआई निदेशक की घोषणा अभी बाकी है। उम्मीद है कि जल्द ही नाम सामने आएगा।
- राहुल गांधी की असहमति नोट और पत्र सार्वजनिक हो चुका है, जिससे राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
- संसद के मानसून सत्र से पहले यह घटना विपक्ष को मुद्दा देने वाली साबित हो सकती है।
विश्लेषण: संस्थागत नियुक्तियों में विपक्ष की भूमिका
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सिर्फ आलोचना तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि महत्वपूर्ण नियुक्तियों में सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है। राहुल गांधी की असहमति इस बात को रेखांकित करती है कि पारदर्शिता और दस्तावेज उपलब्धता के बिना प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। वहीं, सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए समयबद्ध फैसले जरूरी हैं।
यह घटना दर्शाती है कि बड़े लोकतंत्र में सहमति और मतभेद दोनों साथ चलते हैं। चाहे सीबीआई हो, सीआईसी हो या अन्य संवैधानिक पद, इनकी निष्पक्षता लोकतंत्र की मजबूती है।राहुल गांधी की इस यात्रा और बैठक ने एक बार फिर साबित किया कि राजनीति में विरोध के बावजूद संस्थागत प्रक्रियाओं में भागीदारी जारी रहती है। आगे क्या होता है, यह देखना दिलचस्प होगा – क्या नई नियुक्ति पर सहमति बनेगी या विवाद और गहराएगा?
ALSO READ-
- Swasti Mehul Jain of ‘Ram Aayenge’ Fame to Perform at Rajnandgaon Dussehra Festival
- VHP, Bajrang Dal Submit Memorandum to Rajnandgaon Collector Over Gaurinagar Incident
- Cow Slaughter During Navratri Is a Heinous Crime: Congress Leader Shahid Bhai
- Police Personnel Offer Prayers at Maa Bamleshwari Temple After Nine Days of Navratri Duty
- Chhattisgarh’s Expanding Rail Network Set to Transform Connectivity and Accelerate Industrial Growth



