खैरागढ़ विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन की कहानी
इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय का नाम अब हुआ राजकुमारी इंदिरा सिंह कला एवं संगीत विश्वविद्यालय
Published on: May 24, 2026
By: BTNI
Location: Rajnandgaon, India
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले खैरागढ़ में स्थित एशिया प्रसिद्ध इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि संगीत, कला और विरासत की जीवंत पहचान रहा है। दशकों तक इस विश्वविद्यालय का नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के मन में एक ही धारणा बनती रही—यह नाम पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर रखा गया है।
दिलचस्प बात यह रही कि केवल आम जनता ही नहीं, बल्कि कई वरिष्ठ पत्रकार, बुद्धिजीवी और राजनीतिक जानकार भी इसी भ्रम में रहे। वर्षों तक किसी ने खुलकर यह सवाल नहीं उठाया कि आखिर विश्वविद्यालय के नाम की वास्तविक “इंदिरा” कौन थीं।
अब समय बदला है
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा विश्वविद्यालय का आधिकारिक नाम बदलकर “राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय” किए जाने के बाद उस लंबे भ्रम का अंत हो गया, जो वर्षों से इतिहास पर पर्दा डाले हुए था।
दरअसल, विश्वविद्यालय का नाम कभी राजकुमारी इंदिरा सिंह के सम्मान में रखा गया था, न कि इंदिरा गांधी के नाम पर। यह तथ्य इतिहास के पन्नों में मौजूद था, लेकिन सार्वजनिक स्मृति में धीरे-धीरे धुंधला पड़ गया।
खैरागढ़ राजपरिवार का कला, संगीत और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। स्वर्गीय राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और राजपरिवार ने जिस सांस्कृतिक विरासत को जन्म दिया, उसी की नींव पर यह विश्वविद्यालय खड़ा हुआ। लेकिन विडंबना यह रही कि वर्षों तक विश्वविद्यालय की पहचान उस परिवार से अधिक राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी धारणा में उलझी रही।
नाम परिवर्तन के बाद विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा ने इसे केवल औपचारिक बदलाव नहीं, बल्कि खैरागढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता को सम्मान लौटाने वाला ऐतिहासिक निर्णय बताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय से नाम को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई थी, जिसके कारण विश्वविद्यालय की स्थापना में राजपरिवार के योगदान की सही जानकारी लोगों तक नहीं पहुंच पाती थी।
राजपरिवार की सदस्य राजकुमारी शताक्षी सिंह ने भी इस निर्णय को सांस्कृतिक विरासत के सम्मान का क्षण बताया। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार नाम परिवर्तन की प्रक्रिया आसान नहीं थी। राजकुमारी इंदिरा सिंह से जुड़े दस्तावेज सीमित उपलब्ध थे। ऐसे में विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. मंगल चंदानी ने कम समय में आवश्यक अभिलेख जुटाकर शासन को उपलब्ध कराए, जिसके बाद प्रक्रिया पूरी हो सकी।
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इस निर्णय के बाद खैरागढ़ ही नहीं, पूरे क्षेत्र में उत्साह का माहौल है। लोगों का मानना है कि अब विश्वविद्यालय की पहचान अधिक स्पष्ट होगी और आने वाली पीढ़ियां जान सकेंगी कि इस संस्थान की जड़ें खैरागढ़ राजपरिवार की सांस्कृतिक तपस्या से जुड़ी हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू राजनीति और समय का संबंध भी है। खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्य वर्षों तक राजनीति में प्रभावशाली रहे। राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह से लेकर बाद की पीढ़ियों तक, परिवार के सदस्य सांसद, विधायक और मंत्री रहे और सभी कांग्रेस के हाईकमान से सीधे संबंध रखते थे।
ऐसे में लोग यह सवाल भी उठाते रहे कि यदि विश्वविद्यालय वास्तव में राजकुमारी इंदिरा सिंह के नाम पर था, तो फिर दशकों तक इसे स्पष्ट रूप से सामने क्यों नहीं लाया गया?
कई लोग इसे उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर देखते हैं, जब “इंदिरा” नाम अपने आप में राष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका था। शायद इसलिए किसी ने भ्रम दूर करने का साहस नहीं किया।
लेकिन इतिहास की एक खूबी होती है—वह देर से सही, अपना रास्ता बना ही लेता है। आज जब विश्वविद्यालय के नाम के साथ “सिंह” जुड़ गया है, तो यह केवल एक शब्द का बदलाव नहीं, बल्कि इतिहास के उस अध्याय की वापसी है, जो लंबे समय तक धुंध में छिपा रहा।
लोग अक्सर कहते हैं—“नाम में क्या रखा है?”
पर खैरागढ़ की इस कहानी ने बता दिया कि कभी-कभी नाम में पूरा इतिहास छिपा होता है। और जब वक्त बदलता है, तो वही इतिहास फिर अपनी असली पहचान के साथ सामने आ खड़ा होता है।
उल्लेखनीय है कि राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना 14 अक्टूबर 1956 को खैरागढ़ रियासत के राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती देवी द्वारा की गई थी। यह एशिया के पहले संगीत एवं ललित कला विश्वविद्यालयों में माना जाता है। राजपरिवार ने अपनी पुत्री राजकुमारी इंदिरा सिंह की स्मृति में न केवल इस संस्थान की स्थापना कराई, बल्कि अपना ऐतिहासिक राजमहल भी विश्वविद्यालय के लिए दान कर दिया। प्रारंभ में यह “इंदिरा संगीत अकादमी” के रूप में शुरू हुआ, जो बाद में विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ।



