57 दिनों तक जेल में बंद रहा निर्दोष व्यापारी, MP हाईकोर्ट ने दिए 10 लाख मुआवजे
Published on: May 27, 2026
By: BTNI
Location: Bhopal, India
एक साधारण सी रसोई की मसाला पैकेट किसी व्यक्ति की जिंदगी को 57 दिनों के लिए जेल की सलाखों के पीछे धकेल सकती है — यह कहानी कल्पना नहीं, बल्कि सच्ची घटना है। मध्य प्रदेश के एक व्यवसायी अजय सिंह को भोपाल एयरपोर्ट पर गारम मसाला और आमचूर पाउडर को हेरोइन समझकर गिरफ्तार कर लिया गया। एयरपोर्ट के एक्सप्लोसिव ट्रेस डिटेक्शन (ETD) मशीन ने अलार्म बजा दिया और NDPS एक्ट के तहत केस दर्ज हो गया। अंततः मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में (अप्रैल 2026) इस मामले में उन्हें 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
घटना क्या थी?
वर्ष 2010 में अजय सिंह मलेशिया जाने के लिए भोपाल एयरपोर्ट से दिल्ली होते हुए यात्रा कर रहे थे। सुरक्षा जांच के दौरान उनके सामान में रखे ब्रांडेड गारम मसाला और आमचूर के पैकेट्स ने मशीन में हेरोइन और MDEA (एक साइकोट्रोपिक पदार्थ) का संकेत दिया। बिना ठोस जांच के उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। NDPS एक्ट की सख्त धाराओं के तहत केस दर्ज होने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया।
57 दिनों तक जेल में रहने के बाद सैंपल सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (CFSL), हैदराबाद भेजे गए। रिपोर्ट में साफ हुआ कि उन पैकेट्स में कोई नशीला पदार्थ नहीं था — सिर्फ सामान्य रसोई के मसाले थे। इसके बाद क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई और NDPS कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन तब तक निर्दोष व्यक्ति 57 दिन जेल की यातना झुका चुका था।

हाईकोर्ट का फैसला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को vicariously liable ठहराया। कोर्ट ने कहा कि राज्य की फॉरेंसिक सुविधाओं की कमी, जांच में लापरवाही और स्टैंडर्ड लेबोरेटरी न होने के कारण निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक यातना झेलनी पड़ी। जस्टिस ने आर्टिकल 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हनन मानते हुए 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे तीन महीने के अंदर चुकाना होगा। कोर्ट ने राज्य भर के फॉरेंसिक लैब्स की जांच कराने का भी निर्देश दिया।
लापरवाही की बड़ी समस्या
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उन हजारों निर्दोष लोगों की कहानी है जो ऐसी सिस्टमिक लापरवाही का शिकार होते हैं।
एयरपोर्ट सुरक्षा और मशीनों की सीमाएं: ETD मशीनें कई बार मसालों, परफ्यूम, फल आदि में भी फॉल्स पॉजिटिव दे देती हैं। लेकिन प्रोटोकॉल में तुरंत फॉरेंसिक टेस्ट की बजाय सीधे गिरफ्तारी हो जाती है।
फॉरेंसिक लैब्स की कमी: मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आधुनिक लैब्स की कमी है। सैंपल बाहर भेजने में समय लगता है, NDPS एक्ट की सख्ती के कारण जमानत भी आसानी से नहीं मिल पाती।
असली अपराधी बच जाते हैं, निर्दोष फंस जाते हैं: असली ड्रग तस्कर बड़े नेटवर्क, वकीलों और रिश्वतखोरी के जरिए बच निकलते हैं। जबकि आम आदमी, व्यापारी या यात्री बिना किसी गलती के महीनों जेल काट लेता है। NDPS एक्ट की कठोरता का दुरुपयोग भी होता है।
ऐसे मामलों में परिवार की आर्थिक, मानसिक और सामाजिक तबाही हो जाती है। नौकरी चली जाती है, समाज में बदनामी होती है, और कई बार लोग डिप्रेशन या आत्महत्या के रास्ते पर चले जाते हैं।
क्या सुधार जरूरी हैं?
- एयरपोर्ट पर बेहतर ट्रेनिंग और बैकअप केमिकल टेस्ट की व्यवस्था।
- NDPS मामलों में प्रारंभिक 72 घंटे के अंदर फॉरेंसिक रिपोर्ट अनिवार्य करना।
- फॉरेंसिक लैब्स का आधुनिकीकरण और हर राज्य में पर्याप्त सुविधाएं।
- फॉल्स पॉजिटिव मामलों में तुरंत मुआवजा और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला एक मिसाल है। इससे सिस्टम में सुधार की उम्मीद जागी है। लेकिन अजय सिंह जैसे हजारों लोग अभी भी इंतजार कर रहे होंगे, जिनकी कहानियां कभी सामने नहीं आतीं।
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निष्कर्ष
गारम मसाला जैसी सामान्य चीज भी अगर ‘हेरोइन’ बन सकती है तो हमारी जांच प्रणाली कितनी कमजोर है, यह सोचने वाली बात है। निर्दोषों को न्याय मिलना चाहिए और लापरवाही करने वाले अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। अन्यथा आम नागरिक का विश्वास कानून व्यवस्था पर से उठ जाएगा।
नोट: यह घटना 2010 की है, लेकिन मुआवजे का फैसला अप्रैल 2026 में आया। विभिन्न समाचार स्रोतों (Indian Express, Bar & Bench, The Independent आदि) से पुष्टि हुई है।



