अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत छह AAP नेताओं को आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी
सोशल मीडिया अभियान पर सख्त कार्रवाई
Published on: May 19, 2026
By: BTNI
Location: New Delhi, India
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और चर्चित विकास में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, राज्यसभा सांसद संजय सिंह, दिल्ली इकाई अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज, पूर्व विधायक दुर्गेश पाठक, विनय मिश्रा और देवेश विश्वकर्मा समेत छह से अधिक नेताओं को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के मामले में नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 4 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है।
यह मामला दिल्ली आबकारी नीति (Excise Policy) घोटाले से जुड़े सीबीआई के रिवीजन याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायपालिका, खासकर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ कथित सुनियोजित सोशल मीडिया दुष्प्रचार अभियान से जुड़ा है। जस्टिस शर्मा ने 14 मई 2026 को एक विस्तृत 68 पृष्ठों के आदेश में स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लेते हुए अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी।

मामला क्या है? पूरी पृष्ठभूमि
दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 घोटाले में सीबीआई और ईडी ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य AAP नेताओं पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए थे। फरवरी 2026 में ट्रायल कोर्ट ने 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया था, जिसके खिलाफ सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की।
यह याचिका जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में सुनवाई के लिए आई।सुनवाई के दौरान AAP नेताओं और उनके समर्थकों ने जस्टिस शर्मा पर पक्षपात का आरोप लगाया। केजरीवाल समेत नेताओं ने रिक्यूजल (recusal) की मांग की। अदालत ने रिक्यूजल याचिका खारिज की।
इसके बाद सोशल मीडिया पर जस्टिस शर्मा के खिलाफ कथित रूप से एडिटेड वीडियो, ट्वीट्स, पोस्ट और भाषण वायरल किए गए, जिसमें न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए और उन्हें राजनीतिक दबाव में काम करने का आरोप लगाया गया। अदालत ने इसे “calculated campaign of vilification” यानी सुनियोजित बदनामी अभियान करार दिया।
जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि न्यायिक मौन (judicial silence) का मतलब न्यायपालिका का आत्मसमर्पण नहीं हो सकता। उन्होंने दो विकल्प बताए — चुप रहना या संवैधानिक कर्तव्य निभाना। उन्होंने दूसरे रास्ते को चुना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति, चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, कानून से ऊपर नहीं है।
कौन-कौन से नेता शामिल?
अरविंद केजरीवाल: कथित रूप से अभियान का संचालन करने वाले।
मनीष सिसोदिया: सोशल मीडिया पोस्ट और बयान।
संजय सिंह: X (ट्विटर) पर पोस्ट।
सौरभ भारद्वाज: यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म पर।
दुर्गेश पाठक और विनय मिश्रा: अतिरिक्त सामग्री।
देवेश विश्वकर्मा: AAP के सोशल मीडिया ऑपरेशंस से जुड़े।
अदालत ने इन सभी के खिलाफ Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(c) के तहत कार्रवाई शुरू की, जो अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने, न्याय प्रक्रिया में बाधा डालने या न्यायपालिका का अपमान करने से संबंधित है।

19 मई की सुनवाई: क्या हुआ?
19 मई को जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुदेजा की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई की। बेंच ने सभी आरोपियों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा। यह मामला अब क्रिमिनल कंटेम्प्ट की रोस्टर वाली बेंच के सामने है।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने मुख्य आबकारी नीति मामले से खुद को अलग कर लिया, लेकिन स्पष्ट किया कि यह रिक्यूजल स्वीकार करने के कारण नहीं, बल्कि अवमानना कार्यवाही शुरू होने के कारण संस्थागत मुद्दा बन गया है। मुख्य केस अब जस्टिस मनोज जैन की अदालत में जाएगा।
जस्टिस शर्मा का सख्त रुख
68 पृष्ठों के आदेश में जस्टिस शर्मा ने लिखा:सोशल मीडिया पर 59 सेकंड के एडिटेड वीडियो और चुनिंदा क्लिप्स का इस्तेमाल कर न्यायाधीश की छवि खराब की गई।
राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग कर अदालत पर दबाव बनाने की कोशिश की गई।
अगर न्यायाधीशों को शक्तिशाली व्यक्तियों के सामने चुप रहना पड़े तो न्याय स्वयं ही शिकार बन जाएगा।
निष्पक्ष आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन धमकी, बदनामी और समानांतर अभियान नहीं।
अदालत ने परिवार के सदस्यों के खिलाफ भी टिप्पणियों पर आपत्ति जताई।
AAP का पक्ष और प्रतिक्रिया
AAP नेताओं ने इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया है। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि जस्टिस शर्मा ने दो सिद्धांत दोहराए — एक खुद के लिए नहीं बल्कि न्यायपालिका के संस्थान के लिए, और दूसरा असुविधाजनक रास्ता चुनना। AAP का कहना है कि वे कानूनी लड़ाई लड़ेंगे और जवाब दाखिल करेंगे। कुछ नेताओं ने बीजेपी नेताओं द्वारा समान टिप्पणियों पर कार्रवाई न होने का मुद्दा उठाया।
कानूनी और संवैधानिक महत्व
यह मामला सोशल मीडिया युग में न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता को लेकर बड़ा परीक्षण है। विशेषज्ञों का कहना है कि:
न्यायिक निंदा (scandalizing the court) की परिभाषा का विस्तार हो रहा है।
राजनीतिक दलों को याद दिलाया गया कि अदालतें संविधान के प्रति जवाबदेह होती हैं, न कि किसी व्यक्ति या पार्टी के प्रति।
Contempt of Courts Act के तहत सजा अधिकतम 6 महीने कैद या जुर्माना हो सकती है।
पिछले वर्षों में कई मामलों में सोशल मीडिया अभियानों पर अदालतें सख्त हुई हैं, लेकिन उच्च पदस्थ नेताओं के खिलाफ यह दुर्लभ और मजबूत कदम माना जा रहा है।
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आगे क्या?
चार सप्ताह बाद AAP नेताओं को अपना लिखित जवाब दाखिल करना होगा, जिसमें वे साबित करेंगे कि उनके बयान और पोस्ट अवमानना नहीं थे या वे निष्पक्ष आलोचना के दायरे में आते हैं। डिवीजन बेंच फैसला सुनाएगी।यह घटनाक्रम दिल्ली राजनीति को भी प्रभावित करेगा। केजरीवाल और सिसोदिया पहले से ही अन्य मामलों में कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। आबकारी नीति केस की मुख्य सुनवाई अब नई बेंच में होगी, जहां सीबीआई अपनी चुनौती पेश करेगी।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट का यह कदम न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए मजबूत संदेश है। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि “न्याय किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के सामने नहीं झुकता, बल्कि केवल संविधान के सामने झुकता है।” यह मामला न सिर्फ AAP नेताओं बल्कि पूरे देश के लिए यह तय करेगा कि सोशल मीडिया पर न्यायाधीशों की आलोचना की सीमा कहां तक है।न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान हर नागरिक का कर्तव्य है। इस मामले पर सभी की नजरें अब 4 अगस्त की सुनवाई पर होंगी, जब AAP नेताओं के जवाब और अदालत का अंतिम फैसला तय करेगा कि यह अभियान कहां तक गया और इसके परिणाम क्या होंगे।



