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राजनीतिक सोच को दर्शाती एक घटना

नक्सलवाद पर टकराव: डॉ. रमन सिंह बनाम कांग्रेस का दृष्टिकोण

(पुरुषोत्तम तिवारी)

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद को लेकर राजनीतिक दलों की सोच में अंतर को एक महत्वपूर्ण घटना के जरिए समझा जा सकता है।

डॉ.विनायक सेन को 14 मई 2007 को बिलासपुर (छत्तीसगढ़) से पुलिस ने नक्सलियों से संबंध होने के आरोप में गिरफ्तार किया था। दिसंबर 2010 में रायपुर की एक अदालत ने उन्हें राजद्रोह के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद अप्रैल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी।

डॉ रमन सिंह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री थे, तब खुफिया सूचनाओं, गहन जांच और लगातार प्रयासों के बाद पुलिस को एक बड़ी सफलता मिली। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में नक्सलियों के थिंक टैंक डॉ विनायक सेन को गिरफ्तार किया गया, जिन पर नक्सली गतिविधियों से जुड़े होने और वैचारिक समर्थन देने के साथ साथ देशद्रोह के आरोप भी लगे। गिरफ्तारी के दौरान नक्सल साहित्य और संबंधित दस्तावेज मिलने की बातें भी सामने आई।

इस गिरफ्तारी के बाद मामला राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया। देशभर के वामपंथी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर डॉ. बिनायक सेन के समर्थन में आवाज उठी। विरोध प्रदर्शन हुए और उनके परिचितों ने उन्हें एक सरल एवं संवेदनशील व्यक्ति बताते हुए गिरफ्तारी पर सवाल खड़े किए।

Barbarika Truth News India-image= April 4, 2026
राजनीतिक सोच को दर्शाती एक घटना अमित शाह

बाद में उन्हें न्यायालय से जमानत मिल गई। लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने राजनीतिक रूप ले लिया। केंद्र में डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने डॉ. बिनायक सेन को योजना आयोग का सदस्य नियुक्त किया। इस निर्णय से मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गहरा असंतोष जताया।

उनके अनुसार यह एक बड़ा विरोधाभास था—एक ओर नक्सलवाद से जुड़े गंभीर आरोप और दूसरी ओर देश की नीति निर्धारण संस्था में जिम्मेदारी। अपने विरोध को स्पष्ट करते हुए डॉ. रमन सिंह ने योजना आयोग की बैठकों में स्वयं शामिल न होने का निर्णय लिया और राज्य की ओर से मुख्य सचिव विवेक ढांढ को भेजना शुरू कर दिया। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश था, जिसे नक्सलवाद के प्रति केंद्र सरकार की कथित नरम नीति के विरोध के रूप में देखा गया।

यह पूरा घटनाक्रम उस बड़े परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए, जिसमें डॉ. रमन सिंह का कार्यकाल रहा। वर्ष 2004 में वे पहली बार छत्तीसगढ़ के निर्वाचित मुख्यमंत्री बने और लगातार तीन कार्यकाल तक लगभग 15 वर्षों तक प्रदेश का नेतृत्व किया। उनके शुरुआती दो कार्यकाल के दौरान केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। ऐसे में राज्य और केंद्र के बीच नक्सलवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर दृष्टिकोण का अंतर कई बार सामने आया।

डॉ. रमन सिंह का प्रशासनिक दृष्टिकोण संतुलित और दृढ़ माना जाता रहा। उन्होंने नक्सल समस्या से निपटने के लिए कई पहल कीं, जिनमें सलवा जुडूम जैसे अभियान भी शामिल रहे, जो अपने आप में एक बड़ा और चर्चित कदम था जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थी।

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हालांकि इस पर राजनीतिक मतभेद भी रहे, लेकिन राज्य स्तर पर नक्सलवाद के खिलाफ एक संगठित प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा नक्सलवाद के खिलाफ सख्त नीति अपनाई गई। उन्होंने यह स्पष्ट कहा था कि निश्चित समयसीमा में नक्सल समस्या पर निर्णायक प्रहार किया जाएगा।

तीसरी बार सत्ता में आने के पहले की जनसभाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक मचों से घोषणा की थी यदि उनकी सरकार फिर केन्द्र और राज्य छत्तीसगढ़ में आती है तो 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का सफाया कर देंगे। अब इस स्तर पर इसके परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं, जहां बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में शांति का वातावरण बना है, विकास के रास्ते खुले हैं और आम लोगों को राहत मिली है।

यह भी माना जाता है कि यदि राज्य और केंद्र में एक जैसी राजनीतिक इच्छाशक्ति पहले से होती, तो नक्सल समस्या का समाधान और पहले संभव हो सकता था। आसपास के राज्यों—आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा—में भी समन्वित रणनीति की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है। निष्कर्ष यह घटना और पूरा घटनाक्रम इस बात को स्पष्ट करता है कि नक्सलवाद जैसे गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर राजनीतिक दलों की सोच और रणनीति में कितना अंतर हो सकता है।

जहां एक पक्ष इसे सख्ती और आंतरिक सुरक्षा का विषय मानता है, वहीं दूसरा पक्ष अलग दृष्टिकोण अपनाता दिखाई देता है। आज के परिदृश्य में, जब नक्सल प्रभाव लगातार कम हो रहा है और बस्तर में शांति व विकास की दिशा में ठोस प्रगति दिखाई दे रही है, तब यह बहस और भी प्रासंगिक हो जाती है कि सही नीति और समन्वय से बड़े से बड़े संकट का समाधान संभव है।

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