पूर्वजों की जमीन पर बना हवाई अड्डा, 3,500 करोड़ मुआवजे की मांग
Published on: July 07, 2026
By: BTNI
Location: Raipur, India
एक स्थानीय किसान ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया है कि स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट (रायपुर एयरपोर्ट) की टर्मिनल बिल्डिंग और आसपास की जमीन उनकी पूर्वजों की पैतृक संपत्ति है। 53 वर्षीय किसान अश्वनी बांधे (या अश्विनी बांधे) ने लगभग 3,500 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की है, जिसमें जमीन की मौजूदा कीमत, बकाया किराया, ब्याज और अन्य देय राशियां शामिल हैं। यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
दावे का आधार क्या है?
किसान अश्वनी बांधे के अनुसार, 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने Mana एयरफील्ड बनाने के लिए उनकी परिवार की लगभग 30 एकड़ 18 डिसमिल जमीन अस्थायी रूप से अधिग्रहित की थी। डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत यह अधिग्रहण युद्ध प्रयोजनों के लिए किया गया था और युद्ध समाप्त होने के बाद जमीन वापस कर दी जानी थी। लेकिन परिवार को न तो जमीन लौटाई गई और न ही वादे के अनुसार मुआवजा या किराया दिया गया।
बांधे का कहना है कि परिवार को सालाना 1,300 रुपये किराया मिलना था, जो कभी नहीं दिया गया। 1946 में डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट रद्द होने के बाद भी 1952 के नए कानूनों में परिवार के अधिकारों की अनदेखी हो गई। उन्होंने पिछले 35 वर्षों से इस मामले को लेकर संघर्ष किया है और सरकारी अभिलेखागारों, लाइब्रेरी तथा विभिन्न विभागों से पुराने दस्तावेज जुटाए हैं। हाल ही में राज्य संस्कृति विभाग की एक प्रदर्शनी में मिले रिकॉर्ड्स से प्रमाणित प्रतियां प्राप्त कीं, जिनमें उनके पूर्वजों का नाम उल्लिखित है। संस्कृति विभाग ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के अस्तित्व की पुष्टि की है, लेकिन स्वामित्व पर कोई राय नहीं दी।
कानूनी सफर
बांधे ने पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख किया था, जहां अदालत ने ताजा जांच का आदेश दिया। लेकिन किसान का तर्क है कि सक्षम प्राधिकारों ने पहले ही मामले की जांच कर ली है। इसलिए उन्होंने जून 2026 में सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में स्थायी स्वामित्व बहाली या उचित मुआवजे की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट अभी मामले की मेरिट पर सुनवाई नहीं कर चुका है और यह सब ज्यूडिस (लंबित) है।
मुआवजे की गणना

3,500 करोड़ रुपये की मांग में शामिल हैं:
- जमीन की वर्तमान बाजार मूल्य
- दशकों का बकाया किराया
- उस पर ब्याज
- अन्य परिणामी दावे
किसान का दावा है कि लंबे कानूनी संघर्ष में ही 15-20 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
विपरीत दृष्टिकोण और वास्तविकता
यह मामला ऐतिहासिक भूमि विवादों की जटिलता को दर्शाता है। स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट छत्तीसगढ़ की प्रमुख कनेक्टिविटी है, जिसका विस्तार कई चरणों में हुआ है। सरकारी रिकॉर्ड्स में अधिग्रहण को स्थायी माना गया होगा, लेकिन बांधे पुराने दस्तावेजों के आधार पर अस्थायी अधिग्रहण साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट आमतौर पर पुराने दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड्स, अधिग्रहण नोटिफिकेशन और समय-सीमा (limitation) का गहराई से परीक्षण करता है। ब्रिटिश काल के युद्धकालीन अधिग्रहणों पर कई पुराने मामले अदालतों में आ चुके हैं, लेकिन सफलता दर कम रहती है।

छत्तीसगढ़ में भूमि विवाद
छत्तीसगढ़ में औद्योगिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के चलते भूमि अधिग्रहण के विवाद आम हैं। किसानों की पैतृक जमीन, मुआवजे की अपर्याप्तता और दस्तावेजी साक्ष्यों की कमी अक्सर मुद्दे बनते हैं। यह मामला यदि साबित होता है तो न केवल बड़े मुआवजे का मामला बनेगा, बल्कि अन्य पुरानी परियोजनाओं पर भी असर पड़ सकता है।सोशल मीडिया पर चर्चासोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल होने के बाद लोग दो गुटों में बंटे दिख रहे हैं—कुछ किसान के संघर्ष की सराहना कर रहे हैं तो कुछ इसे अव्यावहारिक और आर्थिक रूप से बोझिल बता रहे हैं। एयरपोर्ट जैसी राष्ट्रीय संपत्ति पर ऐसे दावे विकास कार्यों को प्रभावित कर सकते हैं।
निष्कर्ष:
यह मामला छत्तीसगढ़ के इतिहास, ब्रिटिश काल के भूमि रिकॉर्ड्स और आधुनिक भारत के कानूनी ढांचे के बीच का रोचक संघर्ष है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल अश्वनी बांधे के परिवार के भविष्य को तय करेगा, बल्कि भूमि अधिकारों और ऐतिहासिक दावों पर महत्वपूर्ण मिसाल भी कायम कर सकता है। फिलहाल दोनों पक्षों के तर्कों का इंतजार है। विकास और न्याय के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होगा।
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