खौफ, खून और अब खत्म होती प्रोटेक्शन मनी की व्यवस्था
(मानपुर से ताड़मेटला तक—बड़ी घटनाओं की गूंज के बीच अब बदल रहा है बस्तर का भविष्य)
(पुरुषोत्तम तिवारी)
Published on: April 03, 2026
By: BTNI
Location: Bastar, India
छत्तीसगढ़ के बस्तर और आसपास के नक्सल प्रभावित इलाकों—खासकर राजनांदगांव—ने पिछले चार दशकों में हिंसा, डर और शोषण का वह दौर देखा है, जिसने आम जनजीवन को जकड़ कर रख दिया था। नक्सलियों द्वारा चलाई जा रही “समानांतर सरकार” का सबसे बड़ा आधार था—प्रोटेक्शन मनी और जन-अदालतों के जरिए खौफ। मानपुर और छुरिया: थानों पर हमले, पुलिस की चुनौती राजनांदगांव जिले के मानपुर थाना लूट की घटना नक्सली दुस्साहस का बड़ा उदाहरण रही है, जब थाने को निशाना बनाकर हथियार लूटे गए।

वहीं छुरिया थाना पर भी हमला करने की कोशिश हुई। इस घटना की खास बात यह रही कि— थाने में केवल 3 पुलिसकर्मी मौजूद थे उन्होंने बहादुरी से मुकाबला किया हमले को नाकाम करते हुए 4 नक्सलियों को मार गिराया, जिनमें एक कमांडर भी शामिल था और उन्मौहें मौके से भागने के लिए मजबूर किया। यह घटना बताती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सुरक्षाबलों ने कई बार मोर्चा संभाला।
ताड़मेटला:
एक दर्दनाक अध्याय नक्सली हिंसा का सबसे बड़ा और दर्दनाक उदाहरण ताड़मेटला में देखने को मिला, जहां घात लगाकर किए गए हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए। यह घटना देशभर में नक्सलवाद की भयावहता का प्रतीक बन गई। मदनवाड़ा कांड: नेतृत्व पर सीधा हमला साल 2012 में राजनांदगांव जिले के मदनवाड़ा क्षेत्र में हुए हमले में तत्कालीन एसपी विनोद चौबे( आईपीएस) समेत 29 जवान शहीद हुए। यह हमला इस बात का संकेत था कि नक्सली केवल आम लोगों ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक नेतृत्व को भी निशाना बना रहे थे।
जन-अदालत: दहशत का खुला मंच—
नक्सलियों की “जन-अदालत” बस्तर के लोगों के लिए सबसे बड़ा भय थी। पूरे गांव को इकट्ठा होने का आदेश यहां तक कि बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भी बुलाने का फरमान भीड़ के सामने किसी व्यक्ति को “दोषी” घोषित कर या उसे पुलिस का मुखबिर करार कर क्रूर हत्या,अक्सर गला रेतकर इन जन-अदालतों में लोगों की हत्या कर दी जाती थी, ताकि पूरे इलाके में डर बैठ जाए।

यह केवल सजा नहीं, बल्कि दहशत फैलाने की रणनीति थी। हर वर्ग से वसूली: प्रोटेक्शन मनी का जाल नक्सलियों के इस खौफ के कारण— गरीब हो या अमीर छोटा व्यापारी हो या बड़ा कारोबारी हर किसी को “प्रोटेक्शन मनी” देना मजबूरी बन गया था। वन उपज, परिवहन, हाट-बाजार—हर गतिविधि इस वसूली के दायरे में थी। एक अनुमान के हिसाब से नक्सली लगभग 350 करोड़ रुपए की सालाना वसूली ऐसे कर लेते थे और इसी पैसे से नक्सलियों की पूरी समानांतर व्यवस्था चलती थी।
अब बदलते हालात: सख्ती का असर हाल के वर्षों में सरकार की सख्त रणनीति और लगातार अभियानों के चलते नक्सलियों का प्रभाव कमजोर पड़ा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की नीति— “हिंसा का जवाब सख्ती से”—ने जमीनी स्तर पर असर दिखाया है। निष्कर्ष: डर से निकलता बस्तर बस्तर ने खून, खौफ और शोषण का लंबा दौर देखा है।
अब हालात बदल चुके हैं— दहशत का अंत हो चुका है, जहां दिन में सड़क मार्ग में सन्नाटा हुआ करता था वहां अब रात में भी ट्रैफिक चालू हो चुका है।
प्रोटेक्शन मनी की पकड़ ढीली पड़ते पड़ते अब खत्म हो चुकी है और लोग खुलकर जीने की ओर बढ़ रहे हैं चार दशक के डर के बाद, बस्तर अब राहत और विकास की नई कहानी लिखने की ओर बढ़ रहा है।
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