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“संसार की सब वस्तुएँ सुलभ, पर सत्संग है सबसे दुर्लभ”— जय श्रवण जी महाराज

“बचपन से संस्कार दें तो ध्रुव–प्रहलाद जैसे तेजस्वी व्यक्तित्व स्वतः जन्म लेते हैं

(राजनांदगांव में शिव पुराण कथा के विद्वान वाचक पंडित जय श्रवण जी से संक्षिप्त बातचीत)

Published on: January 08, 2025
By: BTNI
Location: Rajnandgaon, India

रायपुर के समीप स्थित सिमगा (छत्तीसगढ़) से पधारे सुप्रसिद्ध कथावाचक जय श्रवण जी महाराज इन दिनों राजनांदगांव के नंदई क्षेत्र में आयोजित शिव पुराण कथा का भावपूर्ण वाचन कर रहे हैं। कथा प्रवास के दौरान उनका मुकाम कथा पंडाल के सम्मुख  हरिहारनो  निवास, राजनांदगांव में है। कथा का आयोजन श्री गौरीशंकर महिला मंडल,नंदई के द्वारा किया गया है और आज शाम कथा का विश्राम होगा।

आज प्रातः उनसे दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला।
इस अवसर पर उनके साथ हुई आध्यात्मिक एवं सामाजिक विषयों पर संक्षिप्त चर्चा अत्यंत प्रेरणादायक रही। बातचीत के दौरान जय श्रवण जी महाराज ने भारत भूमि की महिमा का अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण वर्णन किया।

उन्होंने कहा कि भारत भूमि देवताओं द्वारा निर्मित है और देवता भी इस पावन भूमि में जन्म लेने के लिए तरसते हैं, क्योंकि भगवान स्वयं इसी भूमि पर अवतार लेते हैं। इसका प्रमुख कारण भारतवासियों का निष्कलंक प्रेम और भाव है। भगवान भाव से बंधे होते हैं और भारत भूमि भक्ति एवं प्रेम की भूमि है।

जय श्रवण जी महाराज ने इसे सरल उदाहरणों से समझाया। उन्होंने कहा कि जैसे ऊंची मंजिलों पर मोटर से पानी पहुंचाया जाता है। जब नल चालू किया जाता है तो पानी नीचे की ओर ही गिरता है वहीं अग्नि का स्वभाव ऊपर की ओर उठना होता है—यदि गड्ढे में अग्नि जलाई जाए तो ज्वाला ऊपर ही जाती है। इसी प्रकार जीव का स्वभाव भी ईश्वर की ओर झुकना है, क्योंकि जीव ईश्वर का ही अंश है।

उन्होंने पृथ्वी को “सप्तद्वीपीय वसुंधरा, भगवती पृथ्वी माता” बताते हुए कहा कि भारत में जन्म लेने वाला प्रत्येक जीव भाग्यशाली है और यदि उसे मानव जीवन प्राप्त हो जाए तो वह अत्यंत सौभाग्यशाली होता है। संतों और शास्त्रों में मानव जीवन को दुर्लभ इसलिए कहा गया है, क्योंकि अनेक जन्मों के पुण्य कर्मों के पश्चात यह प्राप्त होता है। अतः इस जीवन को सत्कर्म, भक्ति और सेवा में लगाकर सार्थक बनाना चाहिए।

जय श्रवण जी महाराज ने भक्ति के महत्व पर बल देते हुए कहा कि सद्भावना पूर्वक भगवान का भजन करना प्रत्येक जीव का कर्तव्य है। भक्ति और पुरुषार्थ से संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। उन्होंने तुलसीदास जी के दोहे का उल्लेख करते हुए कहा कि संसार की सभी वस्तुएं सुलभ हैं, किंतु सत्संग अत्यंत दुर्लभ है। जिसे सत्संग मिल जाए, वह वास्तव में भाग्यशाली है।

उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग कथा-सत्संग में आते हैं, धार्मिक विचार रखते हैं और धर्माचार्यों का सम्मान करते हैं, उन पर निश्चित रूप से भगवान की कृपा होती है।

शिव पुराण कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए जय श्रवण जी महाराज ने कहा कि शिव कथा संपूर्ण कल्याणकारी है। जो भी श्रद्धापूर्वक शिव कथा सुनता है और उसमें कही गई बातों का थोड़ा सा भी आचरण करता है, उसका जीवन कल्याणमय हो जाता है।

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कुछ समसामयिक प्रश्न व महाराज जी का सारगर्भित उत्तर —

जय श्रवण जी महाराज से समसामयिक विषयों पर संवाद :
प्रश्न–उत्तर
शिव पुराण कथा के उपरांत कथावाचक जय श्रवण जी महाराज से समसामयिक विषयों पर संक्षिप्त प्रश्न भी हमने किया जिसका उन्होंने सारगर्भित उत्तर दिया।

प्रश्न 1 :
महाराज जी, कल शिव विवाह प्रसंग के दौरान ऐसा प्रतीत हुआ कि पूरा पंडाल आनंद और भाव-विभोर वातावरण में डूब गया था और आप भी उस आनंद में खो गए थे?
उत्तर :
जय श्रवण जी महाराज ने कहा कि कथा में  इतना आनंद होता है कि जब कथावाचक भावपूर्वक कथा कहता है और श्रोता पूरी श्रद्धा एवं तन्मयता से सुनते हैं, तो दोनों का उद्देश्य केवल एक ही होता है—भगवान के चरण कमलों में शरणागति। ऐसे में कथा केवल वाचन नहीं रह जाती, वह साधना बन जाती है। यही कारण है कि कथावाचक और श्रोता दोनों स्वयं को भूलकर कथा में खो जाते हैं।
प्रश्न 2 :
कल शिव विवाह उत्सव के दौरान हमने देखा कि सैकड़ों श्रद्धालु—विशेषकर महिलाओं की आंखों से अश्रुधारा भी बह रही थी। ऐसे भाव से कथा सुनने वालों को क्या फल प्राप्त होता है?
उत्तर :
महाराज जी ने दृढ़ स्वर में कहा कि शिव कथा सुनने वाला यदि फल न पाए—ऐसा हो ही नहीं सकता। शिव पुराण स्वयं कल्याणकारी ग्रंथ है। जो भी श्रद्धा और भाव से इसे सुनता है, उसका निश्चित रूप से कल्याण होता है।
उन्होंने कहा कि ‘शिव’ शब्द से यदि ‘ई ’ अर्थात इकरांत हटा दें तो ‘शव’ रह जाता है—अर्थात शिव तत्व के बिना जीवन निष्प्राण हो जाता है। इसलिए शिव कथा केवल उत्सव नहीं, अपितु जीवन को अर्थ देने वाली साधना है।
प्रश्न 3 :
आज देश और प्रदेश में गली–गली, मोहल्ले–मोहल्ले में भागवत कथा, शिव पुराण, राम कथा जैसे धार्मिक आयोजन हो रहे हैं, वहीं कुछ लोग सनातन धर्म के अंत की बातें करते हैं वहीं कुछ लोग खुलेआम सनातन को डेंगू व मलेरिया जैसा रोग बताते हैं तो क्या यह मान लिया जाए कि सनातन कभी समाप्त हो सकता है?
उत्तर :
जय श्रवण जी महाराज ने स्पष्ट कहा कि सनातन कभी समाप्त नहीं हुआ और न कभी होगा। सनातन कोई व्यक्ति या संगठन नहीं, बल्कि एक शाश्वत सिद्धांत है। इतिहास साक्षी है कि अनेक आक्रमणकारी आए, अनेक विचारधाराएं चलीं, परंतु सनातन धर्म की ध्वजा को कोई आज तक मिटा नहीं पाया और न ही कोई मिटा पाएगा।
प्रश्न 4 :
यह भी कहा जाता है कि प्राचीन काल में भारत का भूभाग बहुत विशाल था, जो आज सिमट गया है। क्या भविष्य में भारत या सनातन का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है?
उत्तर :
महाराज जी ने कहा कि ऐसा सोचना ही भ्रम है। सनातन को न तो कोई तोड़ सकता है और न ही मिटा सकता है। आज भारत से अधिक सनातन के अनुयायी विदेशों में भी हैं। यह विचारधारा सीमाओं की मोहताज नहीं है। इतिहास गवाह है—जो आए, वे चले गए; सनातन आज भी खड़ा है।
प्रश्न 5 :
आजकल कुछ लोग खुले मंचों से भारत को तोड़ने, असम, बंगाल या केरल को भारत से अलग करने जैसी बातें कर रहे हैं। क्या यह सनातन के लिए चिंताजनक है?
उत्तर :
इस पर मुस्कराते हुए जय श्रवण जी महाराज ने कहा—हम छोटे बमों से डरने वाले नहीं हैं, हम स्वयं बड़े बम हैं।
उन्होंने शिव पुराण के श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कोई उसे हिला नहीं सकता। सत्य और सनातन एक ही हैं, और सत्य को कोई दबा नहीं सकता और न ही कोई ठुकरा सकता है। सत्य मार्ग पर चलते समय बाधाएं आती हैं, लेकिन सत्य कभी पराजित नहीं होता।
प्रश्न 6 (अंतिम) :
आज की युवा पीढ़ी और वर्तमान समाज के सनातनियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर :
जय श्रवण जी महाराज ने कहा कि हमें अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कार सीखना चाहिए। दिनचर्या में बचपन से ही उन्हें हनुमान चालीसा का पाठ करना सीखना चाहिए, घर में रामचरितमानस रामायण का पाठ होते रहना चाहिए, परंपरागत रूप से जो धार्मिक आयोजन त्यौहार उत्सव होते है है उसे मनाना चाहिए। सनातनी परंपरा के अनुसार बच्चों में नित अच्छे संस्कार डालना चाहिये। जिस प्रकार से कच्ची मिट्टी को जैसा चाहे वैसा डाला जा सकता है ठीक उसी प्रकार से हम यदि बचपन से ही अपने बच्चों में सनातनी परंपरागत संस्कार डाले तो हमें ध्रुव व प्रहलाद जैसे बच्चे मिलते ही रहेंगे।

पंडित जय श्रवण जी महाराज से इस संक्षिप्त व सारगर्भित बातचीत के दौरान विजय हरिहारनो भी उपस्थित रहे जो कथा आयोजक मंडल के संरक्षक भी है।

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