Published on: October 05, 2026
By: BTNI
Location:Rajnandgaon, India
एशियन गेम्स 2026 में भारत ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य सहित कुल 85 पदक जीतकर चौथा स्थान हासिल किया। यह उपलब्धि निश्चित रूप से गर्व करने योग्य है। तिरंगे के साथ जब भारतीय खिलाड़ी पदक मंच पर खड़े होते हैं, तो उनके पीछे केवल एक प्रतियोगिता की जीत नहीं होती—
उसके पीछे वर्षों का अभ्यास, असंख्य त्याग, परिवार का सहयोग, प्रशिक्षकों की मेहनत और हार के बाद फिर उठ खड़े होने का जज्बा होता है।
लेकिन किसी भी देश की खेल-यात्रा का मूल्यांकन केवल पदकों की संख्या से नहीं किया जा सकता।
असली सवाल यह है कि क्या भारत अपनी इस उपलब्धि को एक स्थायी और मजबूत खेल संस्कृति में बदल पा रहा है ?85 पदक निश्चित रूप से उत्साह बढ़ाते हैं, लेकिन चौथा स्थान हमें यह भी याद दिलाता है कि एशिया की खेल शक्ति बनने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तुलना में भारत की विशाल आबादी और प्रतिभा के बावजूद हमारी संभावनाएं अभी पूरी तरह सामने नहीं आई हैं।
सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है—प्रतिभा को खोजने से लेकर उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनाने तक की पूरी व्यवस्था को मजबूत करना।
भारत के छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में असंख्य बच्चे ऐसी प्रतिभा रखते हैं जिन्हें उचित मैदान, प्रशिक्षक, उपकरण और आर्थिक सहायता मिल जाए तो वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकते हैं। समस्या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि प्रतिभा तक व्यवस्था की पहुंच की है। एक और बड़ा सवाल खेल सुविधाओं का है।
बड़े शहरों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम और प्रशिक्षण केंद्र विकसित हो रहे हैं, लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य खेल मैदान तक सुरक्षित नहीं हैं। स्कूलों में खेल शिक्षा अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है।
यदि बचपन से खेल को शिक्षा का अनिवार्य और सम्मानित हिस्सा बनाया जाए, तो भारत की अगली पीढ़ी कहीं अधिक बड़ी पदक शक्ति बन सकती है।
हमें खिलाड़ियों की सफलता के बाद उन्हें सम्मानित करने की परंपरा से आगे बढ़ना होगा। खिलाड़ी को पदक जीतने के बाद नहीं, पदक जीतने से वर्षों पहले समर्थन चाहिए।
उसे अच्छे कोच चाहिए, वैज्ञानिक प्रशिक्षण चाहिए, पोषण चाहिए, आधुनिक उपकरण चाहिए, मानसिक स्वास्थ्य और खेल मनोविज्ञान की सुविधा चाहिए तथा चोट लगने पर विश्वस्तरीय चिकित्सा और पुनर्वास व्यवस्था चाहिए।
85 पदकों की सबसे बड़ी सीख यही है कि भारतीय खिलाड़ी क्षमता में किसी से कम नहीं हैं। आवश्यकता है उस व्यवस्था को उनके अनुरूप बनाने की, जो उनकी प्रतिभा को विश्वस्तरीय प्रदर्शन में बदल सके।
इसलिए आज जब पूरा देश अपने खिलाड़ियों को बधाई दे रहा है, तब यह भी संकल्प लेना चाहिए कि अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को केवल पदक जीतने के बाद तालियां न मिलें—उन्हें तैयारी के हर दिन देश का साथ मिले।
एक पदक खिलाड़ी जीतता है, लेकिन उसके पीछे पूरा तंत्र खड़ा होता है।
एशियन गेम्स का यह प्रदर्शन भारत के लिए अंत नहीं, बल्कि अगली बड़ी छलांग की शुरुआत होना चाहिए। 85 पदकों पर गर्व कीजिए, खिलाड़ियों को सलाम कीजिए—और अब ऐसी खेल व्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखिए जिसमें भारत के पास प्रतिभा भी हो, अवसर भी हो और विश्व मंच पर जीतने का पूरा सामर्थ्य भी।
तिरंगा आज 85 पदकों के साथ ऊंचा है। सवाल यह है कि अगली बार उसे और कितना ऊंचा उठाया जा सकता है?
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