Published on: June 15, 2026
By: BTNI
Location: California, India
कैलिफोर्निया की प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में 14 जून 2026 को आयोजित 135वें कमेंसमेंट समारोह में गूगल और अल्फाबेट के सीईओ सुंदर पिचाई को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था। पिचाई खुद स्टैनफोर्ड के पूर्व छात्र हैं, जिन्होंने 1995 में मटेरियल साइंस और इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की थी। समारोह में लगभग 6000 डिग्री प्राप्तकर्ताओं के सामने पिचाई आशावाद, चुनौतियों का सामना करने और आगे बढ़ने की बात करने वाले थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने भाषण शुरू किया, सैकड़ों छात्रों ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए स्टेडियम से बाहर निकलना शुरू कर दिया। कुछ छात्रों ने बू किए, विसिल बजाए, फिलिस्तीनी झंडे लहराए और “फ्री, फ्री फिलिस्तीन” के नारे लगाए। यह घटना तुरंत सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और वैश्विक चर्चा का विषय बन गई।
यह विरोध मुख्य रूप से गूगल की इजरायली सरकार के साथ की गई $1.2 बिलियन की “प्रोजेक्ट निम्बस” क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अनुबंध को लेकर था। छात्र संगठनों जैसे स्टूडेंट्स फॉर जस्टिस इन फिलिस्तीन (SJP) और नो टेक फॉर अपार्थाइड ने इस अनुबंध को इजरायली सैन्य निगरानी और गाजा संघर्ष में तकनीकी सहायता से जोड़कर देखा। उनका आरोप था कि गूगल इस अनुबंध के जरिए इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) को क्लाउड सेवाएं उपलब्ध करा रहा है, जो फिलिस्तीनियों के खिलाफ “युद्ध अपराधों” और निगरानी में मदद कर रहा है। इसके अलावा, गूगल के अमेरिकी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) और डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी के साथ अन्य अनुबंधों पर भी आपत्ति जताई गई।
पृष्ठभूमि और कारण
प्रोजेक्ट निम्बस 2021 में गूगल और अमेजन के बीच इजरायली सरकार के साथ साइन किया गया एक बड़ा क्लाउड कंप्यूटिंग प्रोजेक्ट है। इसमें इजरायल की विभिन्न सरकारी एजेंसियों को एडवांस्ड क्लाउड, AI और मशीन लर्निंग सेवाएं प्रदान की जानी हैं। विरोध करने वाले छात्रों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट इजरायली सैन्य ऑपरेशनों में इस्तेमाल हो रहा है, खासकर अक्टूबर 2023 के बाद गाजा में बढ़े संघर्ष के दौरान। उन्होंने गूगल कर्मचारियों के पिछले विरोधों का भी हवाला दिया, जहां 2024 में कई गूगल कर्मचारियों को प्रोटेस्ट के दौरान नौकरी से निकाला गया था।

स्टैनफोर्ड कैंपस पर यह विरोध नया नहीं है। पिछले वर्षों में कैंपस पर फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शन हुए हैं, जहां छात्रों ने यूनिवर्सिटी निवेश नीतियों और टेक कंपनियों के सैन्य अनुबंधों पर सवाल उठाए। SJP और संबंधित ग्रुप्स ने समारोह से पहले ही अपील की थी कि छात्र पिचाई के भाषण के दौरान वॉकआउट करें और “पीपुल्स कमेंसमेंट” में शामिल हों। उनका मानना था कि टेक अरबपतियों के खाली शब्दों की बजाय नैतिक रुख अपनाना जरूरी है। लगभग 200 छात्रों ने वॉकआउट किया, जबकि कुछ और ने बीच में बैनर दिखाए और झंडे लहराए।
सुंदर पिचाई ने इस दौरान शांति बनाए रखी। उन्होंने भाषण में कहा, “जो मैं सामने देख रहा हूं, वही ग्रेजुएशन होना चाहिए।” उन्होंने AI का जिक्र तक नहीं किया, क्योंकि हाल के अन्य समारोहों में AI पर बोलने वाले स्पीकर्स को बू किया गया था। उनका फोकस व्यक्तिगत विकास, असफलताओं से सीखने और आशावाद पर रहा। पिचाई ने अपनी स्टैनफोर्ड यात्रा की यादें साझा कीं और सलाह दी कि “हर पल सही नहीं होता, लेकिन आगे बढ़ने का रास्ता ढूंढना महत्वपूर्ण है।” भाषण करीब 14 मिनट का था और उन्होंने इसे पूरा किया।
प्रतिक्रियाएं
इस घटना पर प्रतिक्रियाएं विभाजित रहीं। कई पूर्व छात्रों और टेक लीडर्स जैसे विनोद खोसला ने छात्रों की “मूर्खता” की आलोचना की, कहते हुए कि वे अपनी ग्रेजुएशन सेलिब्रेशन को बर्बाद कर रहे हैं। कुछ ने इसे स्वार्थी रवैया बताया। वहीं, फिलिस्तीन समर्थक समूहों ने इसे नैतिक जीत माना और कहा कि यह बड़े पैमाने पर छात्र जागरूकता को दर्शाता है। स्टैनफोर्ड प्रशासन ने समारोह को शांतिपूर्ण बताया और किसी बड़े व्यवधान की पुष्टि नहीं की।यह घटना व्यापक संदर्भ में देखी जा सकती है। अमेरिकी यूनिवर्सिटीज में इजरायल-गाजा संघर्ष को लेकर पिछले दो वर्षों से तनाव बना हुआ है। कई कैंपस पर टेंट सिटी प्रोटेस्ट, पुलिस क्लियरेंस और अकादमिक बहस हुई। टेक इंडस्ट्री, खासकर गूगल, अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट, सरकारों के साथ अनुबंधों के कारण नैतिक दबाव में हैं।
कर्मचारियों और छात्रों के बीच “नो टेक फॉर अपार्थाइड” जैसे अभियान चल रहे हैं, जो टेक कंपनियों से सैन्य और निगरानी प्रोजेक्ट्स से दूर रहने की मांग करते हैं।सुंदर पिचाई का करियर हमेशा से विवादों से ऊपर रहा है। भारत में जन्मे और अमेरिका में सफलता हासिल करने वाले पिचाई गूगल को AI और क्लाउड कंप्यूटिंग की दिशा में ले जा रहे हैं। लेकिन प्रोजेक्ट निम्बस जैसे डील्स ने उन्हें नैतिक सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। गूगल का पक्ष है कि वे बिजनेस करते हैं और अनुबंध सरकारी एजेंसियों के साथ सामान्य हैं, लेकिन आलोचक कहते हैं कि टेक कंपनियां अब युद्ध और मानवाधिकारों से जुड़ी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।
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व्यापक प्रभाव
यह घटना टेक इंडस्ट्री और उच्च शिक्षा के बीच बढ़ते टेंशन को उजागर करती है। स्टैनफोर्ड जैसे संस्थान जहां टेक कंपनियां भर्ती और रिसर्च के लिए आती हैं, वहां छात्र अब नैतिकता पर जोर दे रहे हैं। AI, क्लाउड और सुपरविजन टेक्नोलॉजी के तेज विकास के साथ ऐसे विरोध बढ़ सकते हैं। पिचाई जैसे लीडर्स को अब सिर्फ इनोवेशन नहीं, बल्कि सोशल इम्पैक्ट पर भी जवाबदेही दिखानी होगी।छात्रों के इस कदम ने वैश्विक बहस छेड़ दी है।
कुछ इसे युवा पीढ़ी की सक्रियता मानते हैं, जो जलवायु, युद्ध और असमानता जैसे मुद्दों पर चुप नहीं रहना चाहती। दूसरी ओर, आलोचक कहते हैं कि यह स्वतंत्रता और उपलब्धियों का अपमान है। स्टैनफोर्ड के इस समारोह ने दिखाया कि शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि मूल्यों की लड़ाई भी है।सुंदर पिचाई ने बाद में शायद इस घटना पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की, लेकिन उनका भाषण आशावाद का संदेश देता रहा। यह घटना याद दिलाती है कि सफलता के शिखर पर पहुंचे व्यक्ति भी समाज की बदलती अपेक्षाओं से अछूते नहीं रह सकते। टेक जायंट्स को अब न सिर्फ प्रॉफिट, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी उठानी होगी।



