चिलिका की गोद में बसा दिव्य उत्सव
होली के रंगों में रंगे ओडिशा की अनोखी परंपरा, जहां 24 गांवों के देवी-देवता झांकियों में सजकर चिलिका झील के किनारे एकत्र होते हैं, भक्ति और एकता का अनुपम दृश्य सृजित करते हैं
Published on: March 10, 2026
By: BTNI
Location: Odisa, India
ओडिशा की सांस्कृतिक धरोहर में कई ऐसे उत्सव हैं जो न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि सामाजिक एकता और लोक आस्था की जीवंत मिसाल भी पेश करते हैं। इनमें से एक है पुरी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत चिलिका झील के किनारे बसे मालूद (मालुदा) गांव में मनाया जाने वाला प्रसिद्ध ‘दोल मेलन’ या ‘पांचु दोल मेलन’। यह उत्सव होली के आसपास, विशेष रूप से दोला पूर्णिमा के बाद मनाया जाता है और यह ओडिशा की ग्रामीण परंपराओं का एक अद्भुत नमूना है।

यह उत्सव मुख्य रूप से राधा-कृष्ण की भक्ति पर आधारित है, जहां विभिन्न गांवों के मंदिरों से देवताओं की मूर्तियां (दोला या झांकी में) विधि-विधान से एक पवित्र स्थान पर लाई जाती हैं। मालूद गांव में यह मेला पारिकुड क्षेत्र में आयोजित होता है, जो चिलिका झील के निकट है। लोक परंपरा के अनुसार, यह उत्सव लगभग 150 वर्ष पुराना माना जाता है। पहले के समय में जब सड़कें नहीं थीं, तब जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां नावों से चिलिका झील के पानी पार करके लाई जाती थीं।
आज भी यह परंपरा जीवित है, जहां देवताओं को सजी-धजी बिमाना (पालकी या झांकी) में रखकर जुलूस निकाला जाता है।उत्सव की शुरुआत फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी से होती है और यह पूर्णिमा तक चलता है। मुख्य आकर्षण पांचु दोला का दिन होता है, जो दोला पूर्णिमा के पांचवें दिन मनाया जाता है। इस दौरान 24 से अधिक गांवों के देवी-देवता एकत्र होते हैं। कुल 23 या 24 बिमाना में देवताओं को सजाया जाता है और वे चिलिका के किनारे या पानी पार करके मालूद पहुंचते हैं।

भक्त इन्हें फूलों, रंगों और पारंपरिक संगीत के साथ स्वागत करते हैं। ड्रम, शंख, भजन और लोक गीतों की धुन में पूरा माहौल भक्ति से भर जाता है। लोग गुलाल लगाते हैं, नाच-गाते हैं और एक-दूसरे से मिलते हैं, ठीक वैसे ही जैसे देवता आपस में मिलकर स्नेह के बंधन मजबूत करते हैं।लोकमान्यता है कि इस दिन सभी देवी-देवता एक स्थान पर आकर परस्पर संवाद करते हैं, अपनी मित्रता और स्नेह को नवीनीकृत करते हैं। यह दृश्य इतना मनोरम होता है कि दूर-दूर से भक्त इसे देखने आते हैं।
यह उत्सव न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि सामाजिक सद्भाव का भी प्रतीक है। गांवों के बीच एकता, सहयोग और साझा भक्ति की भावना यहां स्पष्ट दिखाई देती है। चिलिका झील की प्राकृतिक सुंदरता इस उत्सव को और भी आकर्षक बनाती है, जहां पानी, आकाश और धरती एक साथ भक्ति के रंग में रंग जाते हैं।यह परंपरा पुरी की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को दर्शाती है, जहां जगन्नाथ संस्कृति का प्रभाव ग्रामीण जीवन में गहराई से समाया हुआ है। आज के दौर में जब आधुनिकता तेजी से फैल रही है, ऐसे उत्सव हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं। मालूद का दोल मेलन ओडिशा के सांस्कृतिक गौरव का एक जीवंत प्रमाण है, जो भक्ति, प्रकृति और समुदाय की एकता का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है।
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