Published on: July 06, 2026
By: BTNI
Location: Raipur, India
छत्तीसगढ़ की धरती ने अपनी एक अनमोल सांस्कृतिक विरासत खो दी है। महान पंडवानी गायिका टीजन बाई, जिन्हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था, का ५ जुलाई २०२६ को रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे ६९-७० वर्ष की थीं। उनकी मृत्यु भारतीय लोक कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
टीजन बाई का जन्म ८ अगस्त १९५६ को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में पारधी अनुसूचित जनजाति के एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। पिता चुनुक लाल पारधी और माता सुखवती के घर में पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़ी टीजन बचपन से ही गरीबी, अभाव और कठिन परिस्थितियों में पलीं। परिवार का मुख्य व्यवसाय चिड़िया पकड़ना और झाड़ू-चटाई बनाना था। भोजन की कमी और रहने की तंग छत उनके रोजमर्रा की सच्चाई थी। बचपन में नाना बृजलाल पारधी से महाभारत की छत्तीसगढ़ी शैली में सुनाई गई कहानियाँ सुनकर उनकी कलात्मक संवेदना जागृत हुई। उन्होंने औपचारिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन लोक परंपराओं से भरपूर ज्ञान प्राप्त किया।

संघर्ष और चुनौतियाँ
मात्र १२ वर्ष की उम्र में उनका विवाह हो गया, लेकिन घरेलू क्लेश और सामाजिक दबाव के कारण वे १३ वर्ष की उम्र में घर छोड़कर आ गईं। पंडवानी गाने के कारण उनके समुदाय ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया क्योंकि यह कला परंपरागत रूप से पुरुषों द्वारा की जाती थी। टीजन बाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने गांव में एक छोटी-सी झोपड़ी बनाई और पड़ोसियों से बर्तन-भोजन उधार लेकर जीवन यापन किया। सामाजिक विरोध, आर्थिक तंगी और लिंग-भेद की दीवारों को पार करते हुए उन्होंने अपनी कला को जीवित रखा। यह उनका अदम्य साहस और समर्पण ही था जिसने उन्हें सफलता के शिखर तक पहुंचाया।
पंडवानी कला: शैली और योगदान
टीजन बाई कपालिक शैली की प्रमुख विदुषी थीं, जिसमें कलाकार खड़े होकर तंबूरा (एकतारा) बजाते हुए महाभारत के प्रसंगों को नाटकीय अभिनय, भाव-भंगिमाओं और स्वर-शक्ति के साथ प्रस्तुत करता है। वे कर्ण, द्रौपदी, भीम, अर्जुन और कृष्ण जैसे पात्रों में पूरी तरह रम जाती थीं।उनकी प्रस्तुतियाँ छत्तीसगढ़ी भाषा, लोक लय और वीर-करुण रस से ओत-प्रोत होती थीं। उन्होंने वेदमती शैली (बैठकर गाने) को भी अपनाया, लेकिन कपालिक शैली में उनकी जीवंत प्रस्तुतियाँ विश्व भर में प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने पंडवानी को लोकप्रिय कला का दर्जा दिलाया और इसे शास्त्रीय व लोक कला के बीच पुल का रूप दिया।
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उपलब्धियाँ और सम्मान
टीजन बाई की कला को देश-विदेश में खूब सराहा गया:
- पद्म श्री (१९८८)
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (१९९५)
- पद्म भूषण (२००३)
- पद्म विभूषण (२०१९) — छत्तीसगढ़ की पहली प्राप्तकर्ता
- फुकुओका प्राइज (२०१८), एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी शताब्दी सम्मान (२०१६)
- बिलासपुर विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट (डी.लिट.)
उन्होंने भारत के साथ-साथ अमेरिका, यूरोप, जापान आदि देशों में पंडवानी का प्रदर्शन किया और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
अंतिम समय और विरासत
टीजन बाई मई २०२६ से गंभीर रूप से बीमार थीं और २७ मई से AIIMS रायपुर में भर्ती थीं। ५ जुलाई की सुबह करीब २:४५ बजे हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार गनियारी गांव में पूरे राज्य सम्मान के साथ किया गया।टीजन बाई ने साबित किया कि सच्ची कला और समर्पण किसी भी बाधा को पार कर सकता है। उनकी आवाज़, गाथाएँ और संघर्ष की कहानी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।छत्तीसगढ़ की नायिका, लोक-कला की अमर गाथाकार तीजन बाई को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
आपकी कथा अमर है। ॐ शांति।
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