मुद्दा वसूली नहीं, स्पा सेंटर्स की बाढ़ है
Published on: January 21, 2025
By: BTNI
Location: Bilaspur, India
स्पा सेंटर से कथित वसूली के आरोप में एक एडिशनल एसपी का सस्पेंशन केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं है। असली सवाल कहीं ज़्यादा गहरे हैं। सवाल यह नहीं कि अधिकारी सस्पेंड हुए या नहीं—सवाल यह है कि आख़िर स्पा सेंटर्स ही बार-बार विवाद के केंद्र में क्यों हैं?
बिलासपुर में गली-गली खुलते स्पा सेंटर्स और उनसे जुड़ी चर्चाएं अचानक तेज़ क्यों हो गई हैं?
अगर सब कुछ नियमों के तहत, पारदर्शी और वैध है, तो फिर वसूली, दबाव, और सुरक्षा तंत्र की भूमिका जैसे शब्द सामने क्यों आ रहे हैं?
क्या बिना आग के धुआँ उठता है?
यह सवाल अब आम लोगों की ज़ुबान पर है।
एक एडिशनल एसपी जैसे वरिष्ठ अधिकारी का नाम अगर स्पा सेंटर्स से जुड़ी वसूली के आरोपों में सामने आता है, तो स्वाभाविक है कि संदेह की सुई सिर्फ व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम और इस धंधे की प्रकृति पर जाती है।
तेजी से बढ़ते स्पा सेंटर्स यह संकेत तो देते ही हैं कि इसमें मुनाफा सामान्य से कहीं ज़्यादा है। सवाल यह है—
इतनी ज़बरदस्त कमाई आखिर किस वजह से?
क्या यह सिर्फ मसाज और वेलनेस तक सीमित है?
या फिर स्पा की आड़ में कुछ ऐसा चल रहा है, जिसकी वजह से “सेटिंग” और “वसूली” जैसे शब्द जन्म लेते हैं?
चर्चाएं बिलासपुर तक सीमित नहीं
यह घटना अकेली नहीं मानी जा रही। राज्य के अन्य शहरों—खासतौर पर शहरी इलाकों—में भी स्पा सेंटर्स को लेकर समय-समय पर शिकायतें और छापों की खबरें आती रही हैं।
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यही वजह है कि यह मामला अब स्थानीय घटना नहीं, बल्कि राज्य-स्तरीय चिंता बनता जा रहा है।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी
अगर स्पा सेंटर्स में अनैतिक गतिविधियों की बातें सिर्फ अफवाह हैं, तो इसकी पारदर्शी जांच से अफवाहों पर विराम लगना चाहिए। और अगर जांच में ज़रा भी सच्चाई निकलती है, तो फिर—
लाइसेंसिंग सिस्टम,
पुलिस निगरानी,
और नगर प्रशासन की भूमिका
तीनों पर सवाल खड़े होना तय हैं।
सिर्फ सस्पेंशन काफी नहीं
एडिशनल एसपी का सस्पेंशन एक शुरुआत हो सकता है, लेकिन अंत नहीं।
ज़रूरत इस बात की है कि—
सभी स्पा सेंटर्स का बारीकी से ऑडिट हो,
उनके लाइसेंस, गतिविधियों और संचालन की जांच की जाए,
और यह सुनिश्चित किया जाए कि “वेलनेस” की आड़ में समाज के लिए घातक गतिविधियां न पनपें।
क्योंकि अगर गली-गली फैलती यह “गंदगी” यूँ ही नज़रअंदाज़ होती रही, तो यह सिर्फ नैतिक नहीं—सामाजिक महामारी का रूप भी ले सकती है।
अब सवाल साफ है—
क्या यह सिर्फ एक अधिकारी की गलती है,
या सिस्टम की खामोशी में पनपता पूरा नेटवर्क?



